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ग़ज़ल-नूर की -क्या है ज़िन्दगी,

२१२२,२१२२, २१२२, २१२ 
.
सोचने लगता हूँ अक्सर मैं कि क्या है ज़िन्दगी,
आग पानी आसमां धरती हवा है ज़िन्दगी.
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मौत जो मंज़िल है उसका रास्ता है ज़िन्दगी,
या कि अपने ही गुनाहों की सज़ा है ज़िन्दगी.
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बिन तुम्हारे इक मुसलसल हादसा है ज़िन्दगी,
सच कहूँ! ज़िन्दा हूँ लेकिन बेमज़ा है ज़िन्दगी.
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ज़िन्दगी की हर अलामत यूँ तो आती है नज़र,
शोर है शहरों में फिर भी लापता है ज़िन्दगी.
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दिल मुहल्ले में कभी फेरी लगाने आइये,
आप की यादों से भी ना-आशना है ज़िन्दगी.
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जानें किस किस की सुनाती है कहानी तू मुझे
क्या मेरा क़िस्सा भी तूने सुन रखा है ज़िन्दगी?
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निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित  

Views: 662

Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 8, 2017 at 8:27am

शुक्रिया आ. महेंद्र जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 8, 2017 at 8:27am

शुक्रिया आ. गिरिराज जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 8, 2017 at 8:27am

शुक्रिया आ. बैजनाथ जी 

Comment by Mahendra Kumar on March 7, 2017 at 10:07pm
बहुत बढ़िया ग़ज़ल है आ. नीलेश जी। हार्दिक बधाई प्रेषित है। सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 7, 2017 at 3:06pm

आदरनीय नीलेश भाई , खूबसूरत गज़ल  हुई है , हार्दिक बधाइयाँ स्वीकार करें ।

Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on March 5, 2017 at 2:40pm

 बहुत सुन्दर ग़ज़ल ....बधाई स्वीकार करें आदरणीय 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 5, 2017 at 1:57pm

शुक्रिया आ. राजेश दीदी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 4, 2017 at 9:07pm

वाह्ह्ह्ह बहुत सुंदर ग़ज़ल हुई आद० नीलेश भैया शेर दर शेर दाद लीजिये .

Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 4, 2017 at 8:47pm

शुक्रिया आ. डॉ आशुतोष जी 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 4, 2017 at 3:40pm

आदरणीय नूर जी .हर शेर एक से बढ़कर एक   बहुत बढ़िया इस  रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर 

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