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ज़ुबाँ पे सख्त पहरा हो रहा है(गजल)/सतविन्द्र कुमार राणा

1222 1222 122
बिखरकर फिर इकट्ठा हो रहा है
जवाँ फिर से इरादा हो रहा है।

जिसे अपना समझते थे,न जाने
वही क्यों अब पराया हो रहा है?

समन्दर सी छलकती हैं ये आँखें
कोई तो ज़ख्म गहरा हो रहा है।

किसे जाकर सुनाएँ हाल अपना
हमारा शाह बहरा हो रहा है।

भरोसा टूटना लाज़िम हुआ अब
जहाँ का दौर झूठा हो रहा है।

ज़ुबाँ कैसे किसी की अब उठेगी
ज़ुबाँ पे सख़्त पहरा हो रहा है।

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Ravi Shukla on March 17, 2017 at 10:05am

आदरणीय सतविन्‍द्र जी अच्‍छी गजल कही है आपने काेई तो जख्‍म गहरा हो रहा है इस शेर ने अधिक ध्‍यान आर्कषित किया है बधाई स्‍वीकार करें ।

Comment by Mohammed Arif on March 17, 2017 at 8:26am
आदरणीय सतविन्द्र कुमार जी आदाब, बहुत अच्छे अशआर । शेर दर शेर दाद के साथ मुबारक़बाद क़ुबूल कीजिए ।

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