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2122 2122 212

बस झुके हमको तो सबके सर मिले
बुत यहाँ भारी ज़माने पर मिले

काँच के जिनके बनें हैं घर यहाँ
हाथ में उनके ही बस पत्थर मिले।

विष गले में रख सके जग का सकल
है कहाँ मुमकिन कि फिर शंकर मिले।

दिल में उनके है धुआँ गम का बहुत
पर मिले जिससे भी वो हँसकर मिले

फूल को कैसे समझ लें फूल जब
पास उसके ही हमें खंजर मिले

मिल गया अब रहनुमा देखो नया
झोपड़ी को भी नया छप्पर मिले

हैं जहाँ पर दौलतों की रौनकें
*पत्थरों के दिल वहीँ अक्सर मिले।*

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on March 24, 2017 at 1:19pm
आदरणीय सुरेन्द्र नाथ भाई जी,सादर हार्दिक आभार प्रोत्साहन के लिए,सादर नमन!
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on March 24, 2017 at 1:17pm
आदरणीय बृजेश ब्रज भाई जी प्रयास को समय देकर हौंसलाफ़ज़ाई करने के लिए बहुत-बहुत हार्दिक आभार
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on March 24, 2017 at 1:15pm
आदरणीय बैजनाथ मिंटू जी हौंसलाफ़ज़ाई के लिए तहेदिल शुक्रिया मेहरबानी!
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on March 24, 2017 at 1:08pm
आदरणीय सुशील सरना जी,गजल प्रयास को मान देने और प्रोत्साहित करने के लिए तहेदिल शुक्रिया,सादर नमन
Comment by नाथ सोनांचली on March 24, 2017 at 5:34am
भाई सतविंदर जी सादर अभिवादन, बेहतरीन अशआर से सजी उम्दा ग़ज़ल के लिए बधाइयाँ।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 23, 2017 at 8:33pm
वाह वाह बहुत ही खूबसूरत हर एक शेर बेहतरीन..हार्दिक बधाई
Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on March 23, 2017 at 7:13pm

आदरणीय सतविन्द्र साहेब ....बहुत सुन्दर .....बधाई आपको 

Comment by Sushil Sarna on March 23, 2017 at 2:11pm

मिल गया अब रहनुमा देखो नया
झोपड़ी को भी नया छप्पर मिले

हैं जहाँ पर दौलतों की रौनकें
*पत्थरों के दिल वहीँ अक्सर मिले।*
वाह आदरणीय सतविन्द्र जी खूबसूरत अहसासों की इस दिलकश ग़ज़ल के लिए दिल से मुबारकबाद कबूल फरमाएं।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on March 22, 2017 at 9:35pm
आदरणीय बासुदेव अग्रवाल सर,हौंसलाफ़ज़ाई के लिए बहुत-बहुत हार्दिक आभार
Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on March 22, 2017 at 4:47pm
आ0 सतविंदर जी खूबसूरत ग़ज़ल की बधाई स्वीकार करें।
हैं जहाँ पर दौलतों की रौनकें
*पत्थरों के दिल वहीँ अक्सर मिले।*
बहुत सुंदर गिरह।

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