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ज़ुबाँ पे सख्त पहरा हो रहा है(गजल)/सतविन्द्र कुमार राणा

1222 1222 122
बिखरकर फिर इकट्ठा हो रहा है
जवाँ फिर से इरादा हो रहा है।

जिसे अपना समझते थे,न जाने
वही क्यों अब पराया हो रहा है?

समन्दर सी छलकती हैं ये आँखें
कोई तो ज़ख्म गहरा हो रहा है।

किसे जाकर सुनाएँ हाल अपना
हमारा शाह बहरा हो रहा है।

भरोसा टूटना लाज़िम हुआ अब
जहाँ का दौर झूठा हो रहा है।

ज़ुबाँ कैसे किसी की अब उठेगी
ज़ुबाँ पे सख़्त पहरा हो रहा है।

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on March 21, 2017 at 9:29pm
आदरणीय गिरिराज सर,गजल प्रयास को पसन्द कर प्रोत्साहित करने के लिए हार्दिक आभार संग सादर नमन!

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 21, 2017 at 3:21pm

आदरनीय सतविन्द्र भाई , बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है , सभी अशआर अच्छे हुये हैं ... हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on March 20, 2017 at 8:32pm
आदरणीय तस्दीक अहमद खां जी,प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत आभार
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on March 20, 2017 at 8:31pm
आदरणीय बृजेश भाई जी,हौंसलाफ़ज़ाई के लिए तहे दिल शुक्रिया।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on March 19, 2017 at 8:01pm

मुहतरम जनाब सत्विन्दर कुमार साहिब , अच्छी ग़ज़ल हुई है
मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ --

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 19, 2017 at 5:12pm
वाह वाह खूबसूरत बहुत खूबसूरत
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on March 17, 2017 at 6:48pm
आदरणीय तेजवीर जी,सादर नमन!प्रयास पर उपस्थित होकर प्रोत्साहित करने के लिए बहुत बहुत हार्दिक आभार!
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on March 17, 2017 at 6:47pm
आदरणीय रवि शुक्ल सर,आपको प्रयास पसन्द आया यह सार्थक हुआ।सादर हार्दिक आभार संग नमन
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on March 17, 2017 at 6:45pm
आदरणीय मुहम्मद आरिफ साहब,सादर नमन,प्रयास के अनुमोदन ,सराहना कर प्रोत्सहित करने के लिए बहुत-बहुत हार्दिक आभार
Comment by TEJ VEER SINGH on March 17, 2017 at 10:28am

हार्दिक बधाई आदरणीय सतविंदर जी।बेहतरीन गज़ल।
किसे जाकर सुनाएँ हाल अपना
हमारा शाह बहरा हो रहा है।

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