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2122 1212 22/112

लफ़्जों से दर्द की दवा करके
देखा है यूँ भी तज़्रबा करके

तुम पे दहशत कोई मुसल्लत थी
करना क्या था तुम आए क्या करके

खींचता हूँ हयात को मैं फ़क़त
कट रही है खुदा खुदा करके

अपने माज़ी से है सवाल मेरा
क्या मिला उनसे राबिता करके

होश आ जाए नामुरादों को
देखिए मुहतरम दुआ करके

खिड़कियाँ खोल दी शबिस्ताँ की
दिल से सपनो को अब जुदा करके

दस्तबरदार तुमसे हो जाऊँ
सोचा था मैंने हौसला करके

तज़्रबा - अनुभव, मुसल्लत - हावी होना
हयात - ज़िन्दगी, फ़क़त - केवल
माज़ी - अतीत, राबिता - संबंध
शबिस्ताँ - शयन कक्ष, दस्त-बरदार - विरक्त
-मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 3, 2017 at 4:45pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. महेंद्र कुमार जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 3, 2017 at 4:44pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. अनुराग वशिष्ठ जी नवाज़िश

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 3, 2017 at 4:43pm
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सतविंद्र कुमार जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 3, 2017 at 4:43pm
बहुत बहुत शुक्रिया मोहतरम समर कबीर साहिब,

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 3, 2017 at 4:41pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. रवि शुक्ल जी
Comment by Mahendra Kumar on April 2, 2017 at 10:13pm
बहुत ख़ूब ग़ज़ल कही है आपने आदरणीय शिज्जु "शकूर" सर। सभी शेर एक से बढ़कर एक हैं। दिल से ढेरों बधाई प्रेषित है। सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 2, 2017 at 2:09pm
शुक्रिया आ. नीलेश भाई कोशिश रहती है सक्रिय रहने की

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 2, 2017 at 2:00pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. बृजेश जी
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on April 1, 2017 at 5:50pm
आदरणीय शिज्जु शकूर जी शेर दर शेर दाद के साथ मुबारकबाद कबूल करें!
Comment by Samar kabeer on March 31, 2017 at 9:41pm
जनाब शिज्जु शकूर साहिब आदाब,आज का दिन बहुत अच्छा रहा,तीन बहतरीन ग़ज़लें पढ़ने को मिलीं ।
बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

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