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हम तुम, दो तट नदी के

हम तुम
दो तट नदी के
उद्गम से ही साथ रहें हैं
जलधारा के साथ बहे हैं

किन्तु हमारे किस्से कैसे, हिस्से कैसे
सबने देखा, सबने जाना,
रीति-कुरीति, रस्म-रिवाज, अपने-पराये
सब हमारे बीच आये
एक छोर तुम एक छोर मैं
इनकी बस हम दो ही सीमाएं

जब इनमे अलगाव हुआ दुराव हुआ
धर्म-जाति का भेदभाव हुआ
क्षेत्रवाद और ऊँच-नीच का पतितं आविर्भाव हुआ
तब हम तुम
इस जघन्य विस्तार से और दूर हुए
तब भी इन्हें हमने ही हदों में बाँधा


हाय,
हमारा प्यार और ये जगत व्यवहार
दूर से एक दूजे को निहारना, पुकारना
मन ही मन इस सामाजिक व्यवस्था को दुत्कारना

मन में असीम प्यास मिलने की आस लिए
संसार भूल हम दो कूल
आगे बढ़े, समीप आने लगे
फिर वही
रीति-कुरीति, रस्म-रिवाज, अपने-पराये
स्वयं को सिकुड़ते पाये
इस सँकरेपन से पुनः धर्म-जाति क्षेत्रवाद की धारा तेज हुई
मानव और मानवता पर
दानव और दानवता का सैलाब उमड़ा
ये लहरें मानवता की बस्ती लीलने को तैयार हो गई

हम दोनों की तन्द्रा टूटी
ऐसी सामाजिकता, ओछी मानसिकता
डुबो न दे मानव को मानवता को
इसीलिए
मन की असीम प्यास भूल, मिलने की आस भूल
हम फिर से दूर हुए
लहरें शान्त हुईं

हम नही मिलेंगे
क्योंकि हम तो तट हैं
हाँ
साथ बहेंगे साथ रहेंगें
दूर तक
अंत तक

मौलिक एवं अप्रकाशित 

आशीष यादव

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 5, 2017 at 6:00pm

आदरणीय आशीष भाई , गंगा जमनी तहज़ीब पर अच्छी कविता रची आपने , हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 3, 2017 at 10:54pm
बहुत ही सुन्दर कविता हुई
Comment by Samar kabeer on April 1, 2017 at 6:02pm
जनाब आशीष यादव जी आदाब,बहुत सुंदर कविता लिखी,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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