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ये तमाशा तो मेरे ज़ह’न के अन्दर निकला, ग़ज़ल नूर की

गा ल गा गा (ललगागा) / लल गागा/ ललगागा / गा गा (ललगा) 
.
ये तमाशा तो मेरे ज़ह’न के अन्दर निकला,
मैं बशर मैं ही ख़ुदा मैं ही पयम्बर निकला.
.
ये ज़मीं चाँद सितारे ये ख़ला.... सारा जहान, 
वुसअत-ए-फ़िक्र से मेरी ज़रा कमतर निकला.

.
संग-दिल होता जो मैं आप भी कुछ पा जाते,
क्या मेरी राख़ से पिघला हुआ पत्थर निकला?
 
.
सोचता था कि मेरे अश्क हैं क्यूँ कर नमकीन,
ज़ह’न की थाह में गुम-गश्ता समुन्दर निकला.
.  
धडकनों में हुई महसूस कोई तेज़ चुभन,
दिल टटोला तो किसी याद का नश्तर निकला.
.
“नूर जी” ज़ह’न की आज़ादी प इतराते रहे,
पर अना शाह रही, ज़ह’न तो नौकर निकला.
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 14, 2017 at 7:55pm

शुक्रिया आ. बृजेश कुमार जी 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 14, 2017 at 5:06pm
ग़ज़ल को कई बार पढ़ा..कुछ रचनायें होतीं हैं जिन्हें पढ़ते ही जाएं..जो भी रचना पे आएं सभी टिप्पड़ी जरूर पढ़ें बहुत कुछ सीखने को मिलेगा..
Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 13, 2017 at 8:11pm

शुक्रिया आ. महेंद्र जी 

Comment by Mahendra Kumar on April 13, 2017 at 8:07pm
बहुत ही शानदार ग़ज़ल है आदरणीय नीलेश जी। सभी शेर एक से बढ़कर एक हैं। व्यक्तिगत तौर पर इस ग़ज़ल में 'तो' के प्रयोग से मैं सहमत हूँ। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। सादर।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 13, 2017 at 5:51pm

कमेंट्स में तरमीम का शेर है ..उसे फाइनल मानें 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 13, 2017 at 5:43pm

शुक्रिया आ. गुरप्रीत जी ...
.
वुसअत-ए-फिक्र यानी सोच का फ़ैलाव 
आभार 

Comment by Gurpreet Singh jammu on April 13, 2017 at 5:36pm
वाह नीलेश सर जी..क्या खूब ग़ज़ल कही है..सभी अशआर वाकई एक से बढ़कर एक हैं... इन उलझे हुए इन्सानी ख्यालों को आपने कितनी आसानी से कह दिया,और इस तरह कि हर कोई आसानी से समझ सके.
वुसअत-ए-फिक्र का अर्थ जानना चाहता हूँ सर जी
Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 13, 2017 at 7:06am

जी,
आभार आप का  

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 13, 2017 at 12:02am

आ. अनुराग जी,

आप के सुझाव पर मैंने अपनी बात स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है.
भविष्य में भी आप से सकारात्मक सुझावों की अपेक्षा  है ...
आप के या किसी अन्य के सुझावों से मेरा लिखा ही समृद्ध होगा 
सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 13, 2017 at 12:02am

आ. अनुराग जी,

आप के सुझाव पर मैंने अपनी बात स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है.
भविष्य में भी आप से सकारात्मक सुझावों की अपेक्षा  है ...
आप के या किसी अन्य के सुझावों से मेरा लिखा ही समृद्ध होगा 
सादर 

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