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पत्ता जब शाख से गिरा होगा(गजल)/सतविन्द्र

गजल
2122 1212 22/112
पत्ता जब शाख से गिरा होगा
दर्द कुछ तो उसे हुआ होगा

अब्र से आस क्या करे कोई
खुद भी प्यासा तड़प रहा होगा

हाथ में जिसके आज पत्थर हैं
कौन कल उसका रहनुमा होगा?

सिर्फ बातें नहीं अमल भी हो
ऊंचा फिर तेरा मर्तबा होगा।

दिल से राणा निकल गया हर शक
सोच लोगे भला,भला होगा

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 23, 2017 at 10:05am

वाह वाह ..
अच्छी ग़ज़ल हुई  है.
.
अब्र से आस क्या करे कोई
खुद जो प्यासा तड़प रहा होगा..... अब्र से नहीं तो किससे आस करेगा प्यासा?? 
.
अगर ख़ुद भी प्यासा करेंगे तो अब्र के प्यासे होने का भाव आयेगा .
.
हाथ में जिसके आज पत्थर हैं
उसका कल कौन रहनुमा होगा
... यानी कौन नामक व्यक्ति रहनुमा होगा???
यूँ कहें ..
कौन कल उन का रहनुमा होगा ..
मक़ते में भी भाव स्पष्ट   नहीं हैं...

मैंने बहुत महीन बातें कहीं हैं ..इनपर चिन्तन करेंगे और अभ्यास करेंगे तो ग़ज़ल और निखरेगी ..
सादर 

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on April 23, 2017 at 6:51am
आदरणीय तस्दीक अहमद खां जी,सादर नमन,प्रोत्साहन एवं मार्गदर्शन के लिए सादर आभार!
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on April 23, 2017 at 6:08am
आदरणीय मोहम्मद आरिफ साहब सादर वन्दन,प्रयास का अनुमोदन कर प्रोत्साहित करने के लिए तह-ए-दिल से शुक्रिया।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 22, 2017 at 8:30pm
जनाब सतविंदर कुमार साहिब, अच्छी गज़ल हुई है ,शेर दर शेर दाद और मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें --शेर 2 के सानी मिसरे "खुद जो" की जगह "वह तो "ज़्यादा सही लग रहा है---सादर
Comment by Mohammed Arif on April 22, 2017 at 1:48pm
पत्ति जब शाख से गिरा होगा
दर्द कुछ तो उसे हुआ होगा । वाह!वाह!!वाह!!! लाजवाब शे'र
हाथ में आज जिसके पत्थर है
उसका कल कौन रहनुमा होगा । वाह!वाह!!सच है आज कश्मीर के हाथों में पत्थर ही तो है । बिल्कुल सामयिक शे'र कहा ।
ढेरों मुबारकबाद आदरणीय सतविंद्र जी ।

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