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१. 

निद्राधीन निस्तब्धता

कुलबुलाता शून्य

सनसनाता पवन

डरता है मन

अर्धरात्रि में क्यूँ

कोई खटखटाता है द्वार

प्रलय, सोने दो आज

        ------

२.

मेरी ही गढ़ी तुम्हारी आकृति

बारिश की बूँदें

तुम्हारे आँसू

तुम्हारी खिलखिलाती हँसी

कल्पना ही तो हैं सब

वरना 

मुद्दतें हो गई हैं तुमसे मिले

          -----

३.

कभी अपना, कभी

अपनी छाया का भी 

वियोग

दर्द किसका

किसने किसको दिया

किसने ज़्यादा सहा

किसने ज़्यादा दिया

         ------

४.

रह गया है बस

सुनसान के संग

अजाना सुनसान

परिचित में  भी मानो

हैं सब अपरिचित

अवशेष है

परिचित उच्छवास

         ----

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by vijay nikore on August 2, 2017 at 10:28am

इस रचना को मान देने के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय सुशील जी।

Comment by vijay nikore on August 2, 2017 at 10:27am

//आपकी क्षणिकायें गागर  मे सागर की अनुभूति  करा रहीं है ..//

आपके यह शब्द मुझको भावमुग्ध कर गए, आदरणीय भाई गिरिराज जी। हार्दिक धन्यवाद।

Comment by vijay nikore on August 2, 2017 at 10:19am

// अपना ही जिया हुआ अतीत कब स्वप्न सा लगने लगता है , जैसे था ही नहीं। कितना क्षणभंगुर //

आपसे मिली यह सराहना मेरे लिए बहुत निजी है, बहुत ही बहुमूल्य है। आपका आभार, आदरणीय विजय शंकर जी।

Comment by vijay nikore on August 2, 2017 at 10:16am

रचना की सराहना के लिए हार्दिक आभार, आदरणीय सतविन्द्र कुमार जी।

Comment by vijay nikore on May 14, 2017 at 10:09pm

इन क्षणिकाओं में निहित भावनाओं को महसूस करने के लिए आपका हॄदयतल से आभार, आदरणीय भाई समर कबीर जी।

Comment by vijay nikore on May 14, 2017 at 8:15pm
आदरणीय शेख़ शहज़ाद उसमानी जी, रचना की सराहना के लिए हार्दिक आभार।
Comment by Sushil Sarna on May 9, 2017 at 9:33pm
Waaaaaaaah anupm aur aprtim prastuti sir haardik badhaaèeeeeeeeeee sir

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 8, 2017 at 8:02pm

आदरणीय बड़े भाई विजय जी , आपकी क्षणिकाये गागर  मे सागर की अनुभूति  करा रहीं है .. गहन एकाकीपन को चित्रित करती आपकी क्षणिकाओं के लिये हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by Samar kabeer on May 8, 2017 at 6:28pm
जनाब भाई विजय निकोर जी आदाब,सभी क्षणिकाएं गम्भीर सोच का परिणाम हैं जो सबको मयस्सर नहीं आतीं,बहुत ख़ूब वाह, इस सुंदर प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Dr. Vijai Shanker on May 8, 2017 at 7:34am
अपना ही जिया हुआ अतीत कब स्वप्न सा लगने लगता है , जैसे था ही नहीं। कितना क्षणभंगुर।
बहुत सुन्दर प्रस्तुति , आदरणीय विजय निकोर जी , बधाई , सादर।

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