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आदतन हर रोज़ सवेरे-सवेरे

बुझते विश्वास की गहरी पीर

मौन विवशता के आवेशों में

बहता मन में निर्झर अधीर

आस-पास लौट आता है उदास

अकस्मात अनजाने तीखा गहरा

गहरे विक्षोभों का सांवला

देहहीन दर्दीला उभार

ज़िन्दगी के अब ढहे हुए बुर्जों में

विद्रोही भावों के अवशेष धुओं में

है फिर वही, फिर वही असहनीय

अजीब बदनसीब अनथक तलाश

नियति के नियामक चक्रव्यूहों में

पुरानी पड़ गई बिखरती लकीरों में

टूटे विश्वास की पीर के आवेगों में

कब पाया था  किसी ने ठहराव ?

               -------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by vijay nikore on May 4, 2017 at 3:19pm

रचना की सराहना के लिए हार्दिक आभार, आदरणीय सतविन्द्र कुमार जी।

Comment by vijay nikore on April 27, 2017 at 5:55pm

आदरणीय समर भाई, आप मेरी रचनाओं के मर्म को जिस प्रकार समय देते हैं, अनुभव करते हैं, उससे मेरा मन पिघल जाता है... मैं भाग्यवान हूँ कि आपसे ऐसी प्रशंसा मिली। धन्यवाद, आदरणीय भाई समर जी।

Comment by vijay nikore on April 26, 2017 at 2:41pm

//सच है कब किसी ने ठहराव पाया है । चलते रहने में ही जीवन की सार्थकता है //

रचना के मर्म को छूने के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय आरिफ़ भाई।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on April 19, 2017 at 9:11pm
आदरणीय विजय निकोरे सर,भावपूर्ण सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए सादर हार्दिक बधाई!
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on April 19, 2017 at 9:11pm
आदरणीय विजय निकोरे सर,भावपूर्ण सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए सादर हार्दिक बधाई!
Comment by vijay nikore on April 19, 2017 at 2:29pm

आदरणीय सुशील जी, आपने इस कविता को जिस प्रकार स्पर्ष किया, लेखक के लिए इससे अच्छा इनाम और क्या हो सकता है।

हार्दिक आभार, आदरणीय।

Comment by Samar kabeer on April 17, 2017 at 9:42pm
जनाब भाई विजय निकोर जी आदाब,इस कविता के बारे में क्या अर्ज़ करूँ,एक एक लफ़्ज़ अपने आप में एक कहानी बयान करता हुआ महसूस हो रहा है,और यही आपकी लेखनी का कमाल है,पाठक को बांधने में पूरी तरह कामयाब है ये कविता,इस बहतरीन और नायाब प्रस्तुति के लिये दिल की गहराइयों से ढेरों दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
Comment by Mohammed Arif on April 17, 2017 at 10:27am
आदरणीय विजय निकोरे जी आदाब,सच है कब किसी ने ठहराव पाया है । चलते रहने में ही जीवन की सार्थकता है । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Sushil Sarna on April 16, 2017 at 7:44pm

नियति के नियामक चक्रव्यूहों में
पुरानी पड़ गई बिखरती लकीरों में
टूटे विश्वास की पीर के आवेगों में
कब पाया था किसी ने ठहराव ?

वाह आदरणीय विजय निकोर जी दर्द के नए आयाम , शब्दों में छुपी गहराइयाँ , कल कल करते भाव किस पाठक के मन को भाव विभोर होने से रोक पाएंगे ... इस अनुपम और अद्वितीय प्रवाहमयी प्रस्तुति के लिए हृदयतल से बधाई स्वीकार करें सर। मज़ा आ गया ख़ास कर ''गहरे विक्षोभों का सांवला
देहहीन दर्दीला उभार'' वाली पंक्तियों में। वाह

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