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2212-1212-2212-12
थोड़ी तसल्लियों में मेरा इंतजार हो ।
माना कि आज तुम जियादा बेकरार हो ।

वह मैकदों के पास से गुजरा नहीं कभी ।
गर चाहते हो रिन्द को तो इश्तिहार हो ।।

निकला है आज चाँद शायद मुद्दतों के बाद ।
अब वस्ल पर वो फैसला भी आरपार हो ।।

आया शिकार पर न् वो खुद ही शिकार हो ।
इतना खुदा करे उसे बेगम से प्यार हो ।।

लिख्खा दरख़्त पर किसी पगली ने कोई नाम ।

शायद गरीब दिल की कोई यादगार हो।।

हालात हैं खराब क्यों कुछ सोचिये जनाब ।
मुमकिन कहीं नसीब में गहरी दरार हो ।।

कुछ इस तरह से क़ैद में रखिये उसे हुजूर ।।
ऐसा न् हो कि इश्क का मुजरिम फरार हो।।

आये नही वो आज भी महफ़िल के आस पास ।
पूछो कहीं न् और भी सजता दयार हो ।।

रोते दिखे हैं आप भी रुख़सत पे बेहिसाब ।
शायद किसी अदा पे कोई जाँ निशार हो ।।

-- नवीन मणि त्रिपाठी


मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Naveen Mani Tripathi on May 3, 2017 at 2:33pm
आ रवि शुक्ला साहब नमन। मेरे लिए भी यह बहर नई थी इसलिए इस बह्र पर लिखा।
Comment by Ravi Shukla on May 3, 2017 at 11:37am

आदरणीय नवीन जी गजल का प्रयास अच्‍छा है मुबारक बाद हाजिर है । ये बहर हमारे लिये नई है हमने कोई कलाम इस मे अभी तक नहीं पढ़ा

Comment by Naveen Mani Tripathi on May 1, 2017 at 1:37pm
आ0 आरिफ साहब शुक्रिया ।
Comment by Mohammed Arif on May 1, 2017 at 1:33pm
आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब, शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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