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ग्रीष्म के दोहे

सूरज शोले छोड़ता ,पशु भी ढूँढे छाँव ।
दर खिड़की सब बंद है ,सन्नाटे में गाँव ।।

भीषण गरमी पड़ रही,पशु -मानव हैरान ।
भू जल भी घटने लगा, साँसत में है जान ।।

पारा बढ़ता जा रहा, सूख रहे तालाब ।
देखो गाँव महानगर , हालत हुई खराब ।।

पत्ते झुलसे पेड़ पर ,नीम बबूल उदास ।
पशु किसान सबको लगी, पानी की अब आस ।।

.
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment

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Comment by Mohammed Arif on May 11, 2017 at 6:36pm
बहुत-बहुत आभार आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब ।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on May 11, 2017 at 6:21pm
मुहतरम जनाब आरिफ साहिब,गर्मी के मौसम का एहसास दिलाते अच्छे दोहे हुए हैं ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें
Comment by Samar kabeer on May 11, 2017 at 5:55pm
जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,मौसम पर अच्छे बढ़िया दोहे रचे आपने,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Mohammed Arif on May 11, 2017 at 10:00am
बहुत-बहुत आभार आदरणीय नीलेश जी । आपकी टिप्पणी से लेखन सार्थक हुआ । सादर ।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 11, 2017 at 9:30am

वाह आ. मोहम्मद आरिफ़ साहब.
अच्छे मौसमी दोहे प्रस्तुत किये आपने ..
बधाई 

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