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जब यहां खड़े हो रहे हैं
तुम्हारे साथ
मुझे नहीं पता क्या करना है
या कौन हूँ 
खो गया और टूटा हुआ
आदमी
बाहर जोड़े अपने
हाथ
मुझे नहीं पता
कब बारी है
मुझे बहा दिया गया 
आपके द्वारा 
कुचला और टूटा भी
अब मुझे नहीं पता कि मैं कौन हूँ ...

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 28, 2017 at 6:01pm
सूंदर कविता..सादर
Comment by Mohammed Arif on May 24, 2017 at 7:01pm
आदरणीय नरेंद्र सिंह जी आदाब, बेहतरीन भावों की सुंदर बगिया । बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Sushil Sarna on May 24, 2017 at 4:38pm

वाह अंतर्मन के भावों का सुंदर प्रस्तुतीकरण आदरणीय। ... हार्दिक बधाई स्वीकारें। 

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