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।। 2122 2122 2122 212 ।।

पूछिये मत क्यो हमारी शोखियाँ कम पड़ गईं ।
जिंदगी गुजरी है ऐसे आधियाँ कम पड़ गईं ।।

भूंख के मंजर से लाशों ने किया है यह सवाल ।
क्या ख़ता हमसे हुई थी रोटियां कम पड़ गईं ।।

जुर्म की हर इंतिहाँ ने कर दिया इतना असर ।
अब हमारे मुल्क में भी बेटियां कम पड़ गईं ।।

मान् लें कैसे उन्हें है फिक्र जनता की बहुत ।
कुर्सियां जब से मिली हैं झुर्रियां कम पड़ गईं ।।

इस तरह बिकने लगी है मीडिया की शाख भी ।
जब लुटी बेटी की इज्जत सुर्खियां कम पड़ गईं ।।

मैच फिर खेला गया कुर्बानियो को भूलकर ।
चन्द पैसों के लिए रुसवाइयाँ कम पड़ गईं ।।

मत कहो हीरो उन्हें तुम वे खिलाड़ी मर चुके ।
दुश्मनों के बीच जिनकी खाइयां कम पड़ गईं ।।

हो गया नीलाम बच्चों की पढ़ाई के लिए ।
जातियों के फ़लसफ़ा में रोजियाँ कम पड़ गईं ।।

क्यो शह्र जाने लगा है गांव का वह आदमी ।
नीतियों के फेर में आबादियां कम पड़ गईं ।।

देखते ही देखते क्यो लुट गया सारा अमन ।
कुछ लुटेरों के लिए तो बस्तियां कम पड़ गईं ।।

सिर्फ अपने ही लिए जीने लगा है आदमी ।
देखिए अहले चमन में नेकियाँ कम पड़ गईं ।।

यह सही है बेचने वह भी गया ईमान को ।
गिर गई बाज़ार उसकी बोलियाँ कम पड़ गईं ।।

--- नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Naveen Mani Tripathi on June 11, 2017 at 5:17pm
आ0 बृजेश कुमार ब्रज जी शुक्रिया
Comment by Naveen Mani Tripathi on June 11, 2017 at 5:16pm
आ0 मो0 आरिफ साहब शुक्रिया
Comment by Naveen Mani Tripathi on June 11, 2017 at 5:16pm
आ0 महेंद्र कुमार जी आभार
Comment by Mohammed Arif on June 10, 2017 at 10:06pm
आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब, बहुत ही बेहतरीन, लाजवाब ग़ज़ल । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । आदरणीय महेंद्र कुमार जी की बातों पर ग़ौर करें ।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 10, 2017 at 8:42pm
वाह बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही आदरणीय..सादर
Comment by Mahendra Kumar on June 10, 2017 at 4:35pm

आ. नवीन जी, बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. 

//जातियों के फ़लसफ़ा में रोजियाँ कम पड़ गईं// मुझे लगता है यहाँ पर "फ़लसफ़े" होना चाहिए.

//गिर गई बाज़ार उसकी बोलियाँ कम पड़ गईं// और यहाँ पर "गिर गया बाज़ार".

कुछ टंकण त्रुटियाँ भी हैं. देख लीजिएगा. पुनः बधाई. सादर.

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