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भैया मेरे (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

पोस्टमेन भी उस समय मुस्कराकर एक अजीब सी ख़ुशी हासिल कर रहा था, जब चिट्ठी हाथ में थामते हुए सलीम मुस्कराया। उसे पता था कि इस दौर में भी इस घर में अगर चिट्ठी आती है तो बहिन की चिट्ठी हुआ करती है। सलीम को बहुत दिनों बाद बहिन का ख़त मिला था। बीवी से नज़रें बचाकर जब उसने ख़त पढ़ा, तो अपने आंसुओं को रोक नहीं सका। आंसू पोंछ कर फिर से उसने वह ख़त पढ़ा। दो भाइयों की इकलौती बहिन यास्मीन के ख़त की कुछ पंक्तियां उसे झकझोर रही थीं :

"हर बार की तरह इस बार भी रक्षा-बंधन का दिन मैंने तुम दोनों के साथ गुजारा। राखियां बांधीं। तुम दोनों के पसंद के कपड़े पहन कर, तुम दोनों के पसंद की मिठाइयां खिलाईं और खाईं। अल्लाह तआला सब लड़कियों को मेरे जैसा शौहर दे। हां, तुम्हारे दूल्हा भाई बिना किसी एतराज़ के इस बार भी पंडित अवस्थी चाचाजी के घर मुझे ले गये थे। उनके दोनों बेटों अवध और अभिषेक में मुझे तुम दोनों नज़र आते हो। आज भी मेरा कितना ख़्याल रखते हैं वे दोनों, तुम दोनों की तरह! शुक्र है अब्बूजान का, जो हमें अच्छी तहज़ीब तो सिखा गये। और सुनो रत्ती भर भी परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। ई़द, जन्मदिन या शादी की सालगिरह पर मुझे या दूल्हा भाई को कोई गिफ़्ट वगैरह देने या मुझे लेने आने की कोई ज़रुरत नहीं है। मुझे यहां कोई तकलीफ़ नहीं है, किसी बात की कोई कमी नहीं है। मैं तुम दोनों की माली हालत और दीगर परेशानियों से वाक़िफ़ हूं। सब मेरी वज़ह से हुआ। मेरी शादी और दहेज़ के लिए पैसे जमा करने के चक्कर में वालिद साहब तुम दोनों को ढंग से पढ़ा नहीं पाये। लेकिन उनकी दूर की सोच की वज़ह से सलीम तुम मिस्त्री तो बन सके और अरशद इतनी उर्दू और अंग्रेज़ी तो सीख सका कि गृहस्थी किसी तरह चला लेते हो। सच कहूं, तो तुम दोनों भाइयों और अब्बूजान के मुझ पर बहुत अहसान हैं। भाइयों के फर्ज़ आज भी तुम दोनों निभाना चाहते हो, जानती हूं। लेकिन एक बहिन के भी तो कुछ फर्ज़ होते हैं न; जब भी हमारी किसी तरह की मदद की ज़रूरत हो, बेझिझक बताना। ....... यह ख़त कूरिअर से भेजने वाली थी, लेकिन सलीम भाई की हिदायत याद आ गई। फ़िज़ूल ख़र्च मत करो। जानती हूं, तुम दोनों फोन के खर्चे भी सोच समझ के ही करते हो। रक्षा-बंधन के दिन मैंने तुम्हें फोन किया था, लेकिन लगा नहीं। इसलिए ख़त ही लिख रही हूं। ..............।"


तभी किसी की आहट सुन कर सलीम ने ख़त ज़ेब में रख लिया।

"सुनो, आज शाम तक मेरे भाईजान और अम्मी वग़ैरह यहां आने वाले हैं, फोन आया है। रात के खाने का कुछ अच्छा सा इंतज़ाम कर देना।" सलीम अपनी बीवी के इन लफ़्ज़ों को कानों से सुन रहा था, लेकिन उसकी निगाहें बीवी के हाथ में फंसे मोबाइल फोन पर टिकी हुई थीं।

(मौलिक व अप्रकाशित)
(७ अगस्त, २०१७)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on August 8, 2017 at 10:10pm
बहुत बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब समर कबीर साहब मेरी इस रचना पर अपनी राय से वाक़िफ़ कराने व सार्थक मार्गदर्शन के लिए। आपकी दोनों बातें बिल्कुल सही व महत्वपूर्ण हैं।
१- मुझे अभी लघु रचना में लघुकथा कहना सीखने में बहुत वक़्त लगेगा। कोशिशें जारी हैं। इस रचना की बात करें, तो रक्षा-बंधन पर्व के दिन ही अपने कुछ अनुभव समेटकर यह रचना मात्र दो घंटों के भीतर लिख कर पोस्ट कर दी थी। जबकि गुणीजन कहते हैं कि एक लघुआकार सार्थक सशक्त लघुकथा पकने में कम से कम एक महीना और अधिक से अधिक कुछ महीने तो लगते ही हैं। अपनी दिनचर्या के साथ ऐसा कर पाना मेरे लिए मुश्किल हो रहा है। इसलिए मेरे द्वारा पोस्ट की गई रचनाओं पर कभी न कभी और समय देकर उन्हें निखारने/पकाने की कोशिश करूंगा। इस विषय पर मैं भी वरिष्ठजन की टिप्पणियों व मार्गदर्शन की प्रतीक्षा करता हूं।

२- पिछले तीन महीनों से अपने मोबाइल फोनों संबंधित परेशानियों की वजह से ओबीओ पर सभी विधाओं व आयोजनों की रचनाओं पर टिप्पणियां नहीं कर पा रहा हूं। मैं गूगल क्रोम पर ओबीओ चलाता हूं। इस पर टिप्पणियां टाइप करने में अक्सर परेशानी हो रही है। लिखो कुछ और टाइप कुछ और होता है।कर्सर कहीं का कहीं पहुंच जाता है या कहीं पर अड़ जाता है। कुछ समय सोशल मीडिया के लघुकथा समूहों पर भी दे रहा हूं। वैसे मोबाइल फोन सही होते ही आपकी शिक़ायत दूर करने की कोशिश करूंगा।

पुनः मार्गदर्शन प्रदान करने व हौसला अफजाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया।
Comment by Samar kabeer on August 8, 2017 at 6:57pm
जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,बहुत उम्दा और सन्देशप्रद लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
आपके लिए मेरे पास दो सवाल हैं,इस उम्मीद पर लिख रहा हूँ कि आप अन्यथा नहीं लेंगे ।
1-पहले आप पटल की सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिक्रया देते थे,आजकल आप लघुकथाओं तक ही सीमित क्यों हो गए हैं ?
2-लघु का अर्थ होता है 'छोटी'लघुकथा यानी छोटी कथा, इसके बरअक्स देखता हूँ कि बड़ी बड़ी लघुकथाएं यहाँ भी और आयोजन में भी देखने को मिलती हैं,मिसाल के तौर पर यही लघुकथा मुझे तो बड़ी लगी,फिर इसके साथ लघु शब्द क्यों जोड़ा गया है,मेरे ख़याल में लघुकथा का सही पैमाना यही है कि ज़ियादा से ज़ियादा दस पंक्तियों में लिखी जाये,जैसे ग़ज़ल ,इसकी दो पंक्तियों में बड़ी बड़ी दास्तानें समा जाती हैं,और नज़्म में वही दास्ताँ कई सो पंक्तियों में कही जाती है,उसी लिहाज़ से कथा नज़्म हुई और लघुकथा ग़ज़ल की तरह दो नहीं तो दस पंक्तियों की होना चाहिए,कृपया इस पर अपने विचार आप और मंच के लघुकथाकार साझा करने का कष्ट करें ।
Comment by vijay nikore on August 7, 2017 at 9:05pm

बहुत ही अच्छी संदेशप्रद लघु कथा के लिए दिल से बधाई, आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on August 7, 2017 at 12:18pm
त्वरित प्रतिक्रिया, अनुमोदन सहित विचार साझा करने और हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहब। ओबीओ के प्रति आपकी सक्रियता व सीखने-सिखाने की ललक काबिल-ए-तारीफ़ है।
Comment by Mohammed Arif on August 7, 2017 at 12:12pm
आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी आदाब, कथानक में नयापन , ताज़गी का पुट , जिज्ञासा का भरपूर संचार, संवादों में भी कसावट । हमारा देश साम्प्रदायिक सद्भावना वाला देश है । यहाँ गंगा-जमनी तहजीम का प्रवाह रहा है । आपकी यह कथा इसका बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करती है । साम्प्रदायिक सद्भावना का अच्छा संदेश दिया आपने । दिली मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए ।

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