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लघुकथा--कॉमेडियन

"माँ , आज तुमको बताना ही होगा ?" राजू बोला ।
"क्या ?" माँ बोली ।
"यही कि तुम मेरे आज तक के किसी भी एक्ट पर नहीं हँसी । मेरे एक्ट पर तुम्हें हँसी क्यों नहीं आती ? मेरे एक्ट से लोगों के पेट में बल पड़ जाते हैं । सारा शहर मुझे " राजू द ग्रेट
कॉमेडियन " कहता है ।"
" बेटा , जब हमारी भूख , गरीबी , अभाव , पीड़ा और तेरे पिता की कैंसर से मौत ने तुझे ग्रेट कॉमेडियन बना ही दिया है तो मुझे हँसने की क्या ज़रूरत है ।" राजू की आँखों से आँसू छलक पड़े ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment by Nita Kasar on August 25, 2017 at 7:58pm
ग़रीबी की पीड़ा को मां से ज़्यादा और कौन समझ सकता है ।उम्दा कथा के लिये बधाई आद०महेंद्र कुमार जी ।
Comment by Mohammed Arif on August 25, 2017 at 7:58am
आदरणीय महेंद्र कुमार जी लघुकथा की सराहना और मर्म पर प्रतिक्रिया देने का बहुत-बहुत आभार ।
Comment by Mahendra Kumar on August 24, 2017 at 11:25pm

वाह! क्या उम्दा व्यंग्यात्मक लघुकथा प्रस्तुत की है आपने आ. मोहम्मद आरिफ़ जी. आनन्द आ गया. इस उत्कृष्ट प्रस्तुति के लिए दिल से ढेर सारी बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Mohammed Arif on August 24, 2017 at 11:05pm
आदरणीय वीरेंद्र वीर मेहता जी लघुकथा पर आपनी प्रतिक्रिया देकर हौसला अफ़ज़ाई का बहुत-बहुत शुक्रिया ।
Comment by VIRENDER VEER MEHTA on August 24, 2017 at 10:17pm
बहुत उम्दा भाई मोहम्मद आरिफ जी। कम शब्दों में रचना के कथ्य को बढ़िया से उभारा है आपने। जिंदगी की त्रासदियों पर भी कटाक्ष करती इस रचना के लिये बधाई स्वीकार करे आदरणीय।
Comment by Mohammed Arif on August 24, 2017 at 9:46pm
शुक्रिया आदरणीय सलीम रज़ा साहब ।
Comment by Mohammed Arif on August 24, 2017 at 9:45pm
आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी लघुकथा पर निरपेक्ष प्रतिक्रिया देने और हौसला अफजाई का बहुत-बहुत शुक्रिया ।
Comment by SALIM RAZA REWA on August 24, 2017 at 8:27pm
Khoobsurat.
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on August 24, 2017 at 6:49pm
सत्य, यथार्थ, बेहतरीन कटाक्ष। तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहब।

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