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दीप रिश्तों का' बुझाया जो', जला भी न सकूँ 
प्रेम की आग की’ ये ज्योत बुझा भी न सकूँ  |

हो गया जग को’ पता, तेरे’ मे’रे नेह खबर 
राज़ को और ये’ पर्दे में’ छिपा भी न सकूँ |

गीत गाना तो’ मैं’ अब छोड़ दिया ऐ’ सनम 
गुनगुनाकर भी’ ये’ आवाज़, सुना भी न सकूँ |

वक्त ने ही किया’ चोट और हुआ जख्मी मे’रे’ दिल 
जख्म ऐसे किसी’ को भी मैं’ दिखा भी न सकूँ |

बेरहम है मे’रे’ तक़दीर, प्रिया को लिया’ छीन 
ये वो’ किस्मत का’ लिखा है जो’ मिटा भी न सकूँ |

बाल सूरज हो’ गया अस्त है’ सूनी माँ’ की’ गोद 
आँख सूखी, न गिली  किन्तु रुला भी न सकूँ |

ख़ूनी चालाक था’ गायब किया’ सब औजारें 
साक्ष्य कोई नहीं,’ पापी को' फँसा भी न सकूँ |

मिला’ है प्यार मुझे मांगे’ बिना यार मे’रे 
वो’ है’ ‘काली’ मेरा पाथेय, लुटा भी न सकूँ |

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on September 16, 2017 at 1:36pm

इसे तरही आयोजन में पोस्ट करते तो विस्तृत समीक्षा हो जाती 
सादर 

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