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इंतज़ार – लघुकथा -

  इंतज़ार  – लघुकथा  -

 "नीरू बिटिया, आजा मेरी बच्ची, क्यों दरवाजे पर टकटकी लगाये बैठी है। रज्जन अब कभी नहीं लौट कर आनेवाला" स्वर्गीय रज्जन की अम्मा ने अपनी पुत्र वधू निर्मला को साँत्वना देने के लहज़े में पुकारा |

"अम्मा, यह बात तो हम भी जानते हैं। बार बार क्यों दोहराते हो? वह जब फ़ौज़ में गया था तभी हम अपना मन पक्का कर लिये थे। पर ऐसे उसका अंत होगा कि मृत शरीर भी देखने को नहीं मिलेगा , यह कभी नहीं सोचा था"।

"बिटिया, आतंकियों ने बम से चिथड़े  चिथड़े कर दिये मेरे बच्चे के। शायद उसकी तक़दीर में यही लिखा था|  होनी बहुत बलवान होती है" अम्मा ने अपनी गीली आँखों को साड़ी के छोर से पोंछते हुए,  हताश और  भरे गले से कहा|

 "तो उस होनी से हम भी अब दो दो हाथ करना चाहते हैं, अम्मा"।

"तेरा मतलब क्या है मेरी बच्ची"?

"अभी सरकार ने कुछ फ़ौज़ियों की विधवाओं को फ़ौज़ में नौकरी देने की पहल की है, अम्मा"।

"तो क्या तू भी"?

"हाँ अम्मा, हमने भी अपनी अर्ज़ी भेज दी है सरकार को"।

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by TEJ VEER SINGH on October 1, 2017 at 12:07pm

हार्दिक आभार आदरणीय डॉ आशुतोष मिश्रा जी।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 30, 2017 at 9:59pm
आदरणीय तेजवीर जी आपकी यह कथा समाज के लिए अद्भुत सन्देश देती है जिंदगी को वाकई इस अंदाज में ही जाना चाहिए। इस सार्थक रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई सादर
Comment by TEJ VEER SINGH on September 30, 2017 at 9:22pm

हार्दिक आभार आदरणीय शेख उस्मानी जी।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 30, 2017 at 7:52pm
अभी हाल के समाचारों पर बेहतरीन प्रेरक सृजन के लिए सादर हार्दिक बधाई आदरणीय तेज वीर सिंह जी।

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