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इस ज़माने से कई राज़ छुपा रक्खे हैं (ग़ज़ल 'राज')

बहरे रमल मुसम्मिन मख़बून महजूफ़ मक़तूअ--    

2122   1122  1122  22 

एक चेह्रे पे कई चेह्रे लगा रक्खे हैं 
इस ज़माने से कई राज़ छुपा रक्खे हैं 

अश्क आँखों में लिये और हँसी चेह्रे पर 
दर्द हमने कई सीने में दबा रक्खे हैं 

टूट जाएँ न कहीँ अश्क जमीं पर गिरकर 
अपनी पलकों पे करीने से सजा रक्खे हैं 

इस ज़माने को कभी ख्वाब मेरे रास आएँ 
सोचकर अपनी इन आँखों में बसा रक्खे हैं 

दे न पाएगा ज़माना कभी जिनके उत्तर 
दिल ही दिल में वो सवालात दबा रक्खे हैं 

पार होगा ये सफीना मेरा कैसे मौला 
जिंदगी ने कई तूफान उठा रक्खे हैं 

जिंदगी लौट के फिर आ कभी अपने घर पर 
हमने चौखट पे कई दीप जला रक्खे हैं 
---- मौलिक एवं अप्रकाशित 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 3, 2017 at 1:35pm

आद० नरेन्द्र सिंह जी ,आपका बहुत बहुत शुक्रिया |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 3, 2017 at 1:34pm

जनाब सलीम राजा साहब ,आपको ग़ज़ल पसंद आई दिल से बहुत बहुत शुक्रिया |

Comment by narendrasinh chauhan on October 3, 2017 at 11:11am

KHUB SUNDAR RACHNA 

Comment by SALIM RAZA REWA on October 3, 2017 at 8:19am
आ. राजेश कुमारी जी,
ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई,

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 2, 2017 at 10:34pm

मोहतरम जनाब तस्दीक अहमद जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई सुखन नवाजी को बेहद शुक्रिया .मेरा लिखना सार्थक हुआ .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 2, 2017 at 10:33pm

आद० बासुदेव अग्रवाल जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई सुखन नवाजी को बेहद शुक्रिया .मेरा लिखना सार्थक हुआ .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 2, 2017 at 10:32pm

आद० समर भाई जी आदाब ,आपको ग़ज़ल पसंद आई सुखन नवाजी को बेहद शुक्रिया .मेरा लिखना सार्थक हुआ .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 2, 2017 at 10:31pm

आद० सुरेन्द्र नाथ भैया  ,आपको ग़ज़ल पसंद आई सुखन नवाजी को बेहद शुक्रिया .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 2, 2017 at 10:30pm

आद० मोहम्मद आरिफ जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई सुखन नवाजी को बेहद शुक्रिया .

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on October 2, 2017 at 7:30pm
मुहतर्मा राजेश कुमारी साहिबा ,उम्दा ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें

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