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सिसकते बल्ब (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"कमली, तू तो करवा चौथ के दूसरे दिन भी काफी सुंदर लग रही है, सजी-धजी सी!"
मेम साहब की यह टिप्पणी सुनकर कमली उनके कमरे में और अच्छी तरह से झाड़ू लगाने लगी।
"छोड़ ये झाड़ू-पोंछा.. आ बैठ यहां!" कमली का हाथ खींच कर उसे सोफे पर बैठा कर मेम साहब ने पूछा - "सच, बहुत सुंदर और ख़ुश दिख रही है तू!"
"पर आपके सामने हम कहां!"
"चुप्प! छोड़ ऐसी बातें! अच्छा ये बता, तू कितने वाट की है?"
"वाट!"
"हां, कितना वोल्टेज है तुझ में?" इतना कहकर मेम साहब फफक-फफक कर रोने लगी।
उनके ही पल्लू से उनके आंसू पोंछकर कमली ने पूछा- "क्यूं, कल करवा चौथ पर भी साहब ने कुछ बक दिया क्या?"
सिसकते हुए मेम साहब बोलीं - "व्रत खुलवाते ही चांद को देखकर कहने लगे कि क्या ग़ज़ब की एल.ई.डी. है! फिर मैंने पूछा कि मैं क्या हूं? तो बोले - बल्ब चालीस वाट की!"
मालकिन को फिर से रोते देख कमली अपने गदराये बदन का निरीक्षण सा करने लगी।
कमली को बाहों में समेट कर मेम साहब ने पूछा -" अच्छा ये बता, कल रात तुझे अपने आदमी से क्या मिला? जली या बिना जले बुझ गई?"
अपने लम्बे घने काले बालों वाली मोटी चोटियां झटके से लहराकर कमली ने सब कुछ कह दिया और मेम साहब उसे देखकर जल-जल कर बुझीं। सोने की नई चैन उतार कर उन्होंने अपने आलीशान बिस्तर पर फैंक दी। बीती रात याद करते हुए बोलीं-"कमली, कल तो यहां बल्ब जलते और बुझते ही रहे।" सिसकियां फिर से शुरू हो गईं।


(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 19, 2017 at 4:19pm
मेरी इस ब्लॉग पोस्ट पर वक़्त देकर अनुमोदन व हौसला अफज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब समर कबीर साहब, जनाब सलीम रज़ा रीवा साहब और आदरणिया कल्पना भट्ट जी।
Comment by SALIM RAZA REWA on October 11, 2017 at 8:29pm
जनाब उस्मानी साहब,
ख़ूबसूरत लघुकथा के लिए मुबारक़बाद.
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 11, 2017 at 3:15pm

उम्दा लघुकथा ,हार्दिक बधाई |

Comment by Samar kabeer on October 11, 2017 at 11:33am
जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,बहुत उम्दा लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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