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ग़ज़ल - सोचो कुछ उनके बारे में, जिनका दिया जला नहीं

मुफ्तइलुन मुफाइलुन  //  मुफ्तइलुन मुफाइलुन

2112       1212      //   2112      1212

क्या करें और क्यों करें, करके भी फायदा नहीं

दिल में जो दर्द है तो है, लब पे कोई गिला नहीं 

 

उसके कहे से हो गये, लाखों के घर तबाह पर 

उसने कहा कि उसने तो, कुछ भी कभी कहा नहीं

 

सच तो हमेशा राज था, सच था हमेशा सामने

सच तो सभी के पास था, ढूंढे से पर मिला नहीं 

 

दोनों के दोनों चुप थे पर, गहरे में कोई शोर था

दोनों ने ही सुना मगर, दोनों ने कुछ कहा नहीं

           

जाने खिलेंगे ख्वाब कब, जाने कब आएगी बहार,  

वक्त के आसमान पर, अब भी कोई घटा नहीं

 

जब भी जलाओ तुम दिए, अपनी मुड़ेर पर कभी  

सोचो कुछ उनके बारे में, जिनका दिया जला नहीं

"मौलिक-अप्रकाशित" 

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Comment

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Comment by Afroz 'sahr' on October 19, 2017 at 9:48am
आदरणीय अजय जी इस रचना पर आपको बहुत बधाई
Comment by Ajay Tiwari on October 19, 2017 at 8:15am

आदरणीय आरिफ साहब,

आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद.

सादर  

Comment by Mohammed Arif on October 19, 2017 at 8:04am
जब भी जलाओ तुम दिए, अपनी मुड़ेर पर कभी
सोचो कुछ उनके बारे में, जिनका दिया जला नहीं । वाह! वाह!! बहुत ही बढ़िया मक्ता ।
शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें आदरणीय अजय तिवरी जी । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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