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दिल धड़कता था जिस अजनबी के लिए

*212 212 212 212*

हो गया ख़ास वह, ज़िंदगी के लिए।
दिल धड़कता था' जिस, अज़नबी के लिए।।

दूर तुम से रहा, आज तक मैं सनम,
हूँ ख़तावार उस, बेबसी के लिए।।

जान देकर तुझे, जान जाता अगर,
जान जीता नहीं, मयकशी के लिए।।

देख चहरा तिरा, चाँद शरमा गया,
बन गई शम'अ तू, तीरगी के लिए।।

मुझको' रब की कई, नेमतें मिल गईं,
सर झुकाया सदा, बंदगी के लिए।।

बिन तिरे एक पल, मुझको' जीना नहीं,
दिलनशीं चाहिए, दिल्लगी के लिए।।


फ़र्ज़ बाकी अगर, एक भी रह गया,
'दीप' काबिल नहीं, खुदकुशी के लिए।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on November 16, 2017 at 5:32pm
आ० श्याम नारायण वर्मा जी! अभिवादन

ग़ज़ल पर आपकी टिप्पणी पाकर धन्य हुआ।
Comment by Samar kabeer on November 16, 2017 at 5:16pm
जनाब 'दीप'साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Shyam Narain Verma on November 16, 2017 at 12:00pm
बहूत उम्दा हार्दिक बधाई l
Comment by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on November 15, 2017 at 8:24pm
आद० कालीपद प्रसाद मण्डल जी!

आपके द्वारा की गई सराहना हेतु धन्यवाद।

आपकी दृष्टि ग़ज़ल पर पड़ी, ग़ज़ल धन्य हो गई।
Comment by Kalipad Prasad Mandal on November 15, 2017 at 7:56pm

आ प्रदीप कुमार पाण्डेय जी , बहुत बेहतरीन ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकार करें 

Comment by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on November 15, 2017 at 6:24pm
ज़नाब सलीम रज़ा साहिब!

ग़ज़ल में शिरकत-ओ-हौसला आफ्ज़ाई के लिए मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार हूँ।
Comment by SALIM RAZA REWA on November 15, 2017 at 4:16pm
प्रदीप कुमार पांडेय जी,
ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई.

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