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प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'
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प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s Groups

 

प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s Page

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प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' commented on Admin's group ग़ज़ल की कक्षा
"आपकी प्रतिक्रिया पाकर प्रसन्नता हुई, मुझे भी ऐसा ही लग रहा रहा था। अपने संदेह को दूर करने के लिए इस पटल की सहयता लेना आवश्यक समझा। मैं देवनागरी में ही ग़ज़ल लिख रहा हूँ, अतः मुझे इस ग़ज़ल को पूरा करना चाहिए। शीघ्र ही एक ग़ज़ल लिखकर आप सभी के मध्य…"
Feb 6
प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' commented on Admin's group ग़ज़ल की कक्षा
"क्या हमराज़ और मुहताज को मतले में काफिया बाँधा जा सकता है, और फिर आज आवाज़, साज जैसे हर्फ़-ए-कवाफी लेकर आगे के शेर लिखे जा सकते हैं ‌? उस्ताद लोग इस विषय पर मेरी मदद करने की कृपा करें। दरअसल एक ग़ज़ल लिखना चाहता हूं परंतु किसी का हर्फ़े आखिर…"
Feb 6
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post ग़ज़ल: जो भी बनकर हबीब आता है
"बड़ी ही उम्दा ग़ज़ल कही आदरणीय..सादर"
Feb 2
vijay nikore commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post ग़ज़ल: जो भी बनकर हबीब आता है
"गज़ल अच्छी लगी। दिल से बधाई।"
Feb 2
Mohammed Arif commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post ग़ज़ल: जो भी बनकर हबीब आता है
"आदरणीय प्रदीप कुमार जी आदाब,                          बढ़िया अश'आरों से सुसज्जित ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए ।"
Feb 1
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post ग़ज़ल: जो भी बनकर हबीब आता है
"आद0प्रदीप जी सादर अभिवादन। बढिया ग़ज़ल कही आपने,बहुत बहुत बधाई"
Feb 1
Ram Awadh VIshwakarma commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post ग़ज़ल: जो भी बनकर हबीब आता है
"आदर्णीय "दीप" जी बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद कुबूल फरमायें"
Jan 31
TEJ VEER SINGH commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post ग़ज़ल: जो भी बनकर हबीब आता है
"हार्दिक बधाई आदरणीय प्रदीप कुमार जी।बेहतरीन गज़ल। खून मेरा उबलने है लगता,रू-ब-रू जब रकीब आता है।।"
Jan 31
प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' posted a blog post

ग़ज़ल: जो भी बनकर हबीब आता है

*[बहर-ए-खफ़ीफ़ मुसद्दस मख़बून]**2122 1212 22*बन के मेरा हबीब आता है।जो भी दिल के करीब आता है।।सबकी तकदीर में लिखा है सब,कौन बनने गरीब आता है।।खून मेरा उबलने है लगता,रू-ब-रू जब रकीब आता है।।कद्र भाई की है नहीं जिसको,वही लेकर ज़रीब आता है।।आजकल हो गया उसे है क्या,बन के हरदम अजीब आता है।।हौसले देखकर हमारे अबपढ़ने खुतबा ख़तीब आता है।।'दीप' अब ऐतबार है किसकाकाम किसके नसीब आता है।।-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'मौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Jan 31
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post जिंदगी तुझ पर ये दिल भी, कर गया कुर्बान क्यों?
"हार्दिक बधाई ।"
Dec 5, 2017
Manoj kumar shrivastava commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post जिंदगी तुझ पर ये दिल भी, कर गया कुर्बान क्यों?
"आदरणीय पाण्डेय जी, इस रचना पर मेरी बधाई स्वीकार करें।"
Dec 4, 2017
Mohammed Arif commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post जिंदगी तुझ पर ये दिल भी, कर गया कुर्बान क्यों?
"आदरणीय प्रदीप कुमार जी आदाब, बहुत ही बेहतरन ग़ज़ल । दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें । आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब की बेशक़ीमती इस्लाह का संज्ञान लें ।"
Dec 2, 2017
Samar kabeer commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post जिंदगी तुझ पर ये दिल भी, कर गया कुर्बान क्यों?
"जनाब प्रदीप कुमार पाण्डेय'दीप'जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । इस मंच पर ग़ज़ल के साथ अरकान लिखने का नियम है,जो आपने नहीं लिखे? 'पूछता है हाल अब तो मुझसे'मेरा रहगुज़र' इस मिसरे में 'रहगुज़र'शब्द…"
Dec 2, 2017
प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' posted a blog post

जिंदगी तुझ पर ये दिल भी, कर गया कुर्बान क्यों?

बेखब़र क्यों हो गया तू? हो गया अनजान क्यों?ज़िंदगी तुझ पर ये दिल भी, कर गया कुरबान क्यों?बेबसी कुछ भी नहीं थी, जिंदगी के दरमियाँ,चार दिन का बन गया फिर, तू मिरा महमान क्यों?पूछता है हाल अब तो, मुझसे' मेरा रहगुज़र,हो गई है, आजकल ये, ज़िन्दगी वीरान क्यों?बोझ सी लगने लगी है, जिंदगी कुछ रोज़ से,कोई' ऐसा मुझ पे' जाने, कर गया अहसान क्यों?बन गई गुरबत भी दुश्मन, ज़िन्दगी की राह में,ख्वाहिशें क्यों मिट गईं हैं? लुट गये अरमान क्यों?'दीप' तन्हाई मयस्सर, हो रही बदल-ए-वफ़ा,जिंदगी हर मोड़ पर अब, लग रही सुनसान…See More
Dec 2, 2017
प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post मुहब्बत भी निभाना अब सज़ा होने लगा है
"बिल्कुल, समय मिलते ही इन्हें दुरुस्त करूँगा।"
Dec 1, 2017
Samar kabeer commented on प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s blog post मुहब्बत भी निभाना अब सज़ा होने लगा है
"तो,इन मिसरों को पटल पर दुरुस्त कर लीजिये न?"
Dec 1, 2017

Profile Information

Gender
Male
City State
भुज, गुजरात
Native Place
सिमरिया,

प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप''s Blog

ग़ज़ल: जो भी बनकर हबीब आता है

*[बहर-ए-खफ़ीफ़ मुसद्दस मख़बून]*



*2122 1212 22*



बन के मेरा हबीब आता है।

जो भी दिल के करीब आता है।।



सबकी तकदीर में लिखा है सब,

कौन बनने गरीब आता है।।



खून मेरा उबलने है लगता,

रू-ब-रू जब रकीब आता है।।



कद्र भाई की है नहीं जिसको,

वही लेकर ज़रीब आता है।।



आजकल हो गया उसे है क्या,

बन के हरदम अजीब आता है।।



हौसले देखकर हमारे अब

पढ़ने खुतबा ख़तीब आता है।।



'दीप' अब ऐतबार है किसका

काम… Continue

Posted on January 30, 2018 at 2:48pm — 6 Comments

जिंदगी तुझ पर ये दिल भी, कर गया कुर्बान क्यों?

बेखब़र क्यों हो गया तू? हो गया अनजान क्यों?

ज़िंदगी तुझ पर ये दिल भी, कर गया कुरबान क्यों?

बेबसी कुछ भी नहीं थी, जिंदगी के दरमियाँ,

चार दिन का बन गया फिर, तू मिरा महमान क्यों?

पूछता है हाल अब तो, मुझसे' मेरा…

Continue

Posted on December 1, 2017 at 8:37pm — 4 Comments

मुहब्बत भी निभाना अब सज़ा होने लगा है

*1222 1222 1222 122*



ज़माना फिर न जाने क्यों ख़फ़ा होने लगा है।

मुहब्बत भी निभाना अब सज़ा होने लगा है।।



कभी वादे किये जिसने कसम खाकर ख़ुदा की,

वही फिर अब न जाने क्यों ज़ुदा होने लगा है।।



वहाँ पर हाल कैसा है, वही बस जान पाया,

यहाँ पर ज़ख़्म, ज़ख़्मों की दवा होने लगा है।।



समझ बैठा था' तुमको मैं, मुहब्बत का समंदर,

गुमाँ मेरा यहाँ आकर, रफ़ा होने लगा है।।



मुहब्बत का हमेशा ही यही अंज़ाम होता,

शमा से…

Continue

Posted on November 17, 2017 at 5:30pm — 14 Comments

दिल धड़कता था जिस अजनबी के लिए

*212 212 212 212*



हो गया ख़ास वह, ज़िंदगी के लिए।

दिल धड़कता था' जिस, अज़नबी के लिए।।



दूर तुम से रहा, आज तक मैं सनम,

हूँ ख़तावार उस, बेबसी के लिए।।



जान देकर तुझे, जान जाता अगर,

जान जीता नहीं, मयकशी के लिए।।



देख चहरा तिरा, चाँद शरमा गया,

बन गई शम'अ तू, तीरगी के लिए।।



मुझको' रब की कई, नेमतें मिल गईं,

सर झुकाया सदा, बंदगी के लिए।।



बिन तिरे एक पल, मुझको' जीना नहीं,

दिलनशीं चाहिए, दिल्लगी के… Continue

Posted on November 15, 2017 at 3:34pm — 17 Comments

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