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मरीज़-ए-इश्क़ की दवा हकीम कर  सका  नहीं (ग़ज़ल)

मुफाइलुन मुफाइलुन मुफाइलुन मुफाइलुन

बिसात-ए-गैर क्या है जब, नदीम कर सका नहीं।
मरीज़-ए-इश्क़ की दवा हकीम कर  सका  नहीं।।

अदीब से हुए  नहीं  कुछ  एक  काम  आज  तक,

असीर कर  गया  जिसे  फ़हीम  कर सका नहीं।।

लिखीं  पढ़ीं   भले  कई,  कहानियाँ  ज़हान   की,

मगर क़सूर क्या रहा  अज़ीम कर  सका  नहीं।।

मिलान चश्म, चश्म और, क़ल्ब, क़ल्ब का हुआ,

कमाल जो हुआ कभी कलीम  कर  सका  नहीं।।

वज़ूद आम,  आम  और  ख़ास,  ख़ास  का  रहा,

जो काम नून कर गया वो मीम कर सका नहीं।।

हज़ार   कोशिशें   हुईं,   जहाँ-जहाँ    ज़हान   है,

जमाल हो गया मगर नसीम कर  सका  नहीं।।

अज़ीब   दास्तान   'दीप'   की  रही  ज़हान   में,

तबादला किया मगर न'ईम  कर  सका  नहीं।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on March 2, 2018 at 11:48am

शुक्रिया ज़नाब सुरेंद्र  ज़नाब लक्ष्मण धामी साहिब। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 27, 2018 at 11:22pm

सुंदर गजल हुई है, हार्दिक बधाई ।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on February 27, 2018 at 8:01pm

आद0 प्रदीप कुमार पांडेय जी सादर अभिवादन। बहुत बेहतरीन और उम्दा ग़ज़ल। शैर दर शैर मुबारकवाद कुबूल फरमाएं। सादर

Comment by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on February 26, 2018 at 10:55pm

जनाब समर साहिब!

नसीम स्त्रीलिंग है, इसका इल्म मिसरा कहते वक़्त था, लिहाज़ा शेर उसी बिना पर कहा गया है. अलबत्ता आपका इस्लाह काबिले गौर है, ग़ज़ल में शिरकत, हौसला आफज़ाई और आपके इस्लाह के लिए ममनून-ओ-शुक्रगुज़ार हूँ। 

Comment by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on February 26, 2018 at 10:51pm

जनाब हर्ष महाजन जी!
ग़ज़ल में शिरकत और हौसला आफज़ाई के लिए तहे दिल से शुक्रिया। 

Comment by Samar kabeer on February 26, 2018 at 6:09pm

जनाब प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' जी आदाब,ग़ज़ल अच्छी हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

छटे शैर में 'नसीम' शब्द स्त्रीलिंग है, देखियेग ।

Comment by Harash Mahajan on February 26, 2018 at 4:38pm

आ. प्रदीप कुमार जी आदाब ।

ख्याल के हिसाब से एक बेहतरीन और अच्छी प्रस्तुती । 

बहर के मुतल्लक गुणीजनो का इंतज़ार ।

सादर

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