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मुहब्बत भी निभाना अब सज़ा होने लगा है

*1222 1222 1222 122*

ज़माना फिर न जाने क्यों ख़फ़ा होने लगा है।

मुहब्बत भी निभाना अब सज़ा होने लगा है।।


कभी वादे किये जिसने कसम खाकर ख़ुदा की,

वही फिर अब न जाने क्यों ज़ुदा होने लगा है।।


वहाँ पर हाल कैसा है, वही बस जान पाया,

यहाँ पर ज़ख़्म, ज़ख़्मों की दवा होने लगा है।।


समझ बैठा था' तुमको मैं, मुहब्बत का समंदर,

गुमाँ मेरा यहाँ आकर, रफ़ा होने लगा है।।


मुहब्बत का हमेशा ही यही अंज़ाम होता,

शमा से मिल के' परवाना फ़ना होने लगा है।।


नज़र से पीने' का पहले, मज़ा दिलकश लगा था,

मगर अब ज़ाम पीने का, जिया होने लगा है।।


यहाँ पर 'दीप' का तो है, वही अंदाज़ कायम,

वहाँ हर शख़्स अब शायद, ख़ुदा होने लगा है।।



-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 812

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Comment by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on December 1, 2017 at 10:26pm
बिल्कुल, समय मिलते ही इन्हें दुरुस्त करूँगा।
Comment by Samar kabeer on December 1, 2017 at 9:04pm
तो,इन मिसरों को पटल पर दुरुस्त कर लीजिये न?
Comment by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on December 1, 2017 at 8:45pm

जनाब समर कबीर साहिब!

सलाह देने के लिए शुक्रिया. बिलकुल सही कहा अपने रब्त नहीं है. क्योकि मुझे भी यह मिसरे पढने में समस्या हो रही है.

Comment by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on December 1, 2017 at 8:43pm

आद०  सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' 

तहे दिल से शुक्रिया 

Comment by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on December 1, 2017 at 8:42pm

आद० बासुदेव अग्रवाल 'नमन' दादा जी,

बहुत बहुत धन्यवाद.

Comment by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on December 1, 2017 at 8:41pm

मुहतरम शेख शहजाद उस्मानी साहिब. 

ग़ज़ल में शिरकत और हौसला आफजाई के लिए शुक्रिया

Comment by vijay nikore on November 23, 2017 at 11:26am

बहुत खूबसूरत एहसास । हार्दिक बधाई।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 21, 2017 at 12:56pm
वाह बहुतखूब ग़ज़ल हुई.. बधाई
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on November 20, 2017 at 8:39am
जनाब प्रदीप साहिब ,ग़ज़ल की अच्छी कोशिश की है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं । मुहतरम समर साहिब की बातों पर गौर करें
Comment by Mohammed Arif on November 20, 2017 at 8:07am
ज़माना फिर न जाने क्यों ख़फ़ा होने लगा है।
मुहब्बत भी निभाना अब सज़ा होने लगा है।। वाह! वाह!! बहुत माक़ूल बात कही आपने । ज़माना तो सदियों से प्यार का शत्रु रहा है ।
बहुत ही उम्दा ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय प्रदीप कुमार पाण्डे जी ।

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