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चांद का टुकड़ा है या कोई परी या हूर है - सलीम रज़ा रीवा

2122 2122 2122 212

चांद  का टुकड़ा है या कोई  परी या हूर है 
उसके चहरे पे चमकता हर घड़ी इक नूर है

-

हुस्न पर तो नाज़ उसको ख़ूब था पहले से ही 
आइने को देख कर वो और भी मग़रूर है

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हार  कर रुकना नहीं मंज़िल भले ही दूर हो           
ठोकरें  खाकर सम्हलना वक़्त का दस्तूर है

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हौसले  के  सामने तक़दीर  भी  झुक जायेगी
तू बदल सकता है क़िस्मत किसलिए मजबूर है

-

आदमी की चाह हो तो खिलते है पत्थर में फूल
कौन सी मंज़िल भला इस आदमी  से दूर  है

-

ख़ाक  का है पुतला  इंसाँ  ख़ाक में मिल जाएगा
कैसी दौलत कैसी शुहरत क्यों भला मग़रूर है

-

वक़्त से पहले किसी को कुछ नहीं मिलता कभी
वक़्त  के  हाथो  यहाँ  हर  एक शय  मजबूर  है

-

उसकि मर्ज़ी के बिना हिलता नहीं पत्ता कोई 
उसका हर एक फैसला हमको रज़ा मंज़ूर है

-

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment

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Comment by SALIM RAZA REWA on November 18, 2017 at 9:43am

जनाब अफ़रोज़ साहिब ,
ग़ज़ल पे आपकी महब्बत के लिए शुक्रिया ,
आप सही कह रहे हैं ,,,,,,,,वहां है टाइप नहीं हो पाया , आप का शुक्रिया।
'' ख़ाक का पुतला है इंसाँ ख़ाक में मिल जाएगा ''

Comment by Abhinav Arun on November 17, 2017 at 6:47pm

उम्दा ग़ज़ल .दिली मुबारकबाद !!

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on November 17, 2017 at 3:14pm
जनाब सलीम रज़ा साहिब ,उम्दा ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।शेर 6 उला मिसरे में पुतला और इंसां के बीच " है "टाइप होने से रह गया ,देखियेगा
Comment by Afroz 'sahr' on November 17, 2017 at 12:36pm
जनाब सलीम रज़ा साहिब इस ग़ज़ल के लिए आपको बहुत बधाई,,, छठे शेर का ऊला मिसरा बह्र में नहीं है देखिएगा सादर,,

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