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(बिना कोई मात्रा गिराए हिंदी ग़ज़ल)

पलायन का वरण तो दोष क्या है ।
प्रगति पर है ग्रहण तो दोष क्या है ।।

न अपनाओ कभी तुम वह प्रसंशा।
पृथक हो अनुकरण तो दोष क्या है ।।

जिन्हें शिक्षा मिली व्यभिचार की ही ।
करें सीता हरण तो दोष क्या है ।।

मरी हो सभ्यता प्रतिदिन जहां पर ।
नया हो उद्धवरण तो दोष क्या है ।

अनावश्यक अहं की तुष्टि से बच ।
करेंगे संवरण तो दोष क्या है ।।

वो भूखों मर रहा है कौन समझे ।
हुआ है आहरण तो दोष क्या है ।।

जमी घटने लगी इस देश मे अब ।
असम्भव संभरण तो दोष क्या है ।।

यथा सम्भव कहाँ उसने किया कब ।
नहीं हो अंतरण तो दोष क्या है ।


उपेक्षित हो गयी जब संस्कृति ये ।
गलत हो आचरण तो दोष क्या है ।।

-नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by डॉ पवन मिश्र on December 5, 2017 at 7:16am

आदरणीय नवीन जी, उम्दा ग़ज़ल की प्रस्तुति। हां कठिन हिंदी शब्दों के कारण कहीं कहीं आशय तक नहीं पहुंच पाया। जैसे कि उद्धवरण वाला शेर। मतले के कथ्य को लेकर भी व्यक्तिगत शंका है। जमी की वर्तनी भी देखने का सादर आग्रह है।

Comment by Naveen Mani Tripathi on December 2, 2017 at 5:10pm
आ0 मुहम्मद आरिफ़ साहब शुक्रिया।
Comment by Naveen Mani Tripathi on December 2, 2017 at 5:08pm
सादर प्रणाम आ0 कबीर सर । टाइपिंग मिस्टेक शुद्ध करता हूँ ।
Comment by Mohammed Arif on December 2, 2017 at 12:43pm
आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,
शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें ।
सही शब्द "प्रशंसा" ही है जैसा कि आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब ने इंगित किया है ।
Comment by Samar kabeer on December 2, 2017 at 12:22pm
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।
हिन्दी भाषा का मुझे ज्ञान कम है,इसलिये इस ग़ज़ल पर कुछ कहना मेरे लिए मुश्किल है ।
दूसरे शैर में 'प्रसंशा' या "प्रशंसा"?

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