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नवगीत- लुटने को है लाज द्रौपदी चिल्लाती है

अब तो आओ कृष्ण धरा ये थर्राती है।
लुटने को है लाज द्रौपदी चिल्लाती है।।

द्युत क्रीड़ा में व्यस्त युधिष्ठिर खोया है,
अर्जुन का गांडीव अभी तक सोया है।
दुर्योधन निर्द्वन्द हुआ है फिर देखो,
दुःशासन को शर्म तनिक ना आती है।।
लुटने को है लाज द्रौपदी चिल्लाती है।।

धधक रही मानवता की धू धू होली,
विचरण करती गिद्धों की वहशी टोली।
नारी का सम्मान नहीं अब आँखों में,
भीष्म मौन फिर गांधारी सकुचाती है।।
लुटने को है लाज द्रौपदी चिल्लाती है।।

सोने के मृग गली गली अब फिरते हैं,
और जटायू बेबस मर मर गिरते हैं।
लक्ष्मण रेखा लांघ रही देखो सीता,
संत भेष में फिर से रावण घाती है।।
लुटने को है लाज द्रौपदी चिल्लाती है,
अब तो आओ कृष्ण धरा ये थर्राती है।।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by डॉ पवन मिश्र on December 14, 2017 at 5:53pm

आद0 विजय निकोर जी, हृदय से धन्यवाद

Comment by डॉ पवन मिश्र on December 14, 2017 at 5:52pm

आद0 रामबली गुप्त जी, हार्दिक आभार

Comment by vijay nikore on December 14, 2017 at 3:59pm

सुन्दर प्रभावशाली गीत के लिए बधाई, आ० पवन जी।

Comment by रामबली गुप्ता on December 14, 2017 at 3:22am

सुंदर गीत के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय पवन जी

Comment by डॉ पवन मिश्र on December 13, 2017 at 4:14pm

आद0 सुरेंद्र नाथ सिंह जी, हार्दिक आभार

Comment by डॉ पवन मिश्र on December 13, 2017 at 4:14pm

आदरणीय मनोज श्रीवास्तव जी, इस उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिये हृदय से धन्यवाद

Comment by नाथ सोनांचली on December 13, 2017 at 5:02am

आद0 पवन मिश्र जी सादर अभिवादन। बेहतरीन सर्जना हुई है, बहुत उम्दा। आपको इस प्रस्तुति पर कोटिश बधाइयाँ निवेदित है। सादर

Comment by Manoj kumar shrivastava on December 12, 2017 at 9:36pm

आदरणीय डाॅ. पवन मिश्र जी सादर वन्दे! बहुत ही अच्छी रचना है। सादर बधाई स्वीकार करें।

Comment by डॉ पवन मिश्र on December 12, 2017 at 7:37pm

आद0 राजेश कुमारी जी। इस दिशा में मेरा ज्ञान बहुत अल्प है। आग्रह है आपसे कि कृपया गीत और नवगीत को समयानुकूल व्याख्यायित कर दीजियेगा।

Comment by डॉ पवन मिश्र on December 12, 2017 at 6:33pm

आद0 राजेश कुमारी जी, हार्दिक धन्यवाद

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