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मोम नहीं जो दिल पत्थर है-ग़ज़ल

22 22 22 22

मोम नहीं जो दिल पत्थर है
उसका चर्चा क्यों घर-घर है?

मंजिल को पा लेता है वो
जिसने साधी खूब डगर है

लोग पुराने बात पुरानी
फिर भी उनका आज असर है

देख! सँभलना उसने सीखा
जिसने भी खायी ठोकर है

होठों पर मुस्कान भले हो
दिल में गम का इक सागर है

माना सच होता है कड़वा
'राणा' कहता ख़ूब मगर है

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 21, 2017 at 6:48pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी हौंस्लाफ्जाई के लिए सादर हार्दिक आभार,नमन सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 20, 2017 at 4:51pm

भाई सतविंद्र जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 19, 2017 at 8:39pm

आदरणीय अफरोज सहर जी उत्साहवर्धन एवं सुझाव के लिए शुक्रिया.. आपके सुझावानुसार परिष्कार क्र रहा हूँ सादर

Comment by Afroz 'sahr' on December 19, 2017 at 1:24pm

आदरणीय सतविंद्र जी इस रचना पर बधाई आपको पाँचवे शेर के सानी मिसरे में "उसका"  "ग़मका"  "का" की तकरार के सबब रवानी में अटकाव आ रहा है। इसे यूँ किया जासकता है,,,, "दिल में ग़म का इक सागर है"

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 18, 2017 at 10:53pm
आ० महेंद्र कुमार जी हौंसलाफ़ज़ाई के लिए सादर आभार नमन
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 18, 2017 at 10:53pm
आदरणीय तस्दीक अहमद खां जी,हौंसलाफ़ज़ाई के लिए तहे दिल शुक्रिया
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 18, 2017 at 10:52pm
आदरणीय समर कबीर जी आपको प्रयास पसन्द आया,यह सार्थक हुआ। सादर आभार नमन
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 18, 2017 at 10:51pm
आदरणीय सुशील सरन जी उत्साहवर्धन के लिए सादर आभार संग नमन
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 18, 2017 at 10:50pm
आदरणीय बृजेश भाई जी उत्साहवर्धन के लिए बहुत-बहुत आभार
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 18, 2017 at 10:49pm
आदरणीय कालीपद प्रसाद मंडल जी,हौंसलाफ़ज़ाई के लिए तहेदिल आभार

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