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कड़वाहट ....

जाने कैसे
मैंने जीवन की
सारी कड़वाहट पी ली
धूप की
तपती नदी पी ली
मुस्कुराहटों के पैबन्दों से झांकती
जिस्मों की नंगी सच्चाई पी ली
उल्फ़त की ढलानों पर
नमक के दरिया की
हर बूँद पी ली
रात की सिसकन पी ली
चाँद की उलझन पी ली
ख़्वाबों की कतरन पी ली
आगोश के लम्हों की
हर फिसलन पी ली
जानते हो
क्यूँ
शा.... य... द
मैं
तू.... म्हा ... रे
इ.... .श्......क
की
बी.... मा.... र
हो ...गयी ... थी

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 457

Comment

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Comment by Sushil Sarna on December 20, 2017 at 7:40pm

आदरणीय  सतविन्द्र कुमार  जी,  सर प्रस्तुति के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार। 

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 19, 2017 at 9:32pm

इश्क की बीमार .. वाह्ह्ह वाह्ह्ह ,बहुत बधाई आदरणीय 

Comment by Sushil Sarna on December 19, 2017 at 4:11pm

आदरणीय  Mohammed Arif साहिब, आदाब ... सर प्रस्तुति के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार। 

Comment by Mohammed Arif on December 18, 2017 at 7:50pm

आदरणीय सुशील सरना जी आदाब,

                         बहुत ही सुंदर भावों का गुलिस्ता सजाया आपने । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sushil Sarna on December 18, 2017 at 5:53pm
आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब ... सर प्रस्तुति के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार। त्रुटि की तरफ ध्यान आकर्षित करने का हार्दिक आभार। में इसे अभी एडिट कर देता हूँ। थैंक्स सर
Comment by Samar kabeer on December 18, 2017 at 5:26pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,बढ़िया कविता,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'उल्फ़त जे ढलानों पर'---"उल्फ़त की ढलानों पर"

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