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ग़ज़ल -मैं न कहता था, कि मैं निर्दोष था-कालीपद 'प्रसाद'

2122  2122  212

मैं न कहता था, कि मैं निर्दोष था

दोष मुझ पर किन्तु मैं निर्घोष था |

दोष मढने के लिए था चाहिए

देखना इसमें जो’ भी गुणदोष था |

दोष संस्थापन कभी होता था नहीं

पुष्टि वह कानून का उद्घोष था |

किन्तु उनका दोष भी ज्यादा नहीं

शत्रु का तो दृष्टि का वह दोष था |

जान कर भी दोस्त सब रहते तने

मित्र गण भी बोलते दुर्घोष था  |

अब तलक थे मानसिक सब कष्ट में

फैसला तो ज्यों भरा मधुकोष था |

फैसला सुनकर नए रिश्ते बने  

भक्त जन सब ने किया जयघोष था|

निर्घोष= चुप ,नि:शब्द

दुर्घोष= कटु वचन

कालीपद'प्रसाद'

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Mahendra Kumar on December 27, 2017 at 9:58am

ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है आ. कालिपद प्रसाद मण्डल जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए.. आपसे गुज़ारिश है कि दूसरों की ग़ज़लों को ख़ूब पढ़ें. आ. समर सर ने जिस समस्या की बात की है वह दूर हो जाएगी. सादर.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 26, 2017 at 11:03am

हार्दिक बधाई ।

Comment by Mohammed Arif on December 25, 2017 at 12:21am

आदरणीय कालीपद प्रसाद जी आदाब,

                          ग़ज़ल का अच्छा प्रयास । हार्दिक  बधाई स्वीकार करें । आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब की बातों का तत्काल प्रभाव से अमल करें ।

Comment by Samar kabeer on December 24, 2017 at 9:40pm

जनाब कालीपद प्रसाद मण्डल जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

मिसरों में भाषाई कमज़ोरी और व्याकरण की समस्या से अभी आपको बहुत जूझना होगा ।

छटे शैर का ऊला मिसरा बह्र में नहीं है ।

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