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ग़ज़ल -मतभेद दूर करने’ मकालात चाहिए-कालीपद 'प्रसाद'

काफिया : आत ; रदीफ़ : चाहिए

बहर : २२१  २१२१  १२२१  २१२

 

मतभेद दूर करने’ मकालात चाहिए

कैसे बने हबीब मुलाक़ात चाहिए |

 

वादा निभाने’ में तुझे’ दिन रात चाहिए

हर क्षेत्र में विकास का’ इस्बात चाहिए |

 

आतंकबाद पल रहा’ है सीमा’ पार में

जासूसी’ करने’ एक अविख्यात चाहिए |

 

तू लाख कर प्रयास नही पा सकेगा’ रब

भगवान को विशेष मनाजात चाहिए |

 

लातों के’ भूत मानता कब सौम्य बात को

आतंक का अनीफ मकाफ़ात चाहिए |

 

परिवार शह्र में जो भी बेघर हैं’ घर मिले

तब शह्र में अनेक मकानात चाहिए |

 

मदहोश हैं चुनाव ख़ुशी में, मगन सभी

हर गाँव एक एक खराबात चाहिए |

 

नेतायों’ को सुधारने के वास्ते बना

इस कोर्ट का कठोर अशनिपात चाहिए |

शब्दार्थ 

मकालात=गूफ्तगू ,बातचीते  ( ब ब )

इस्बात= सबूत

अविख्यात =जो ख्याति प्राप्त न हो

मनाजात=ईश प्रार्थना, पूजा

अनीफ –तेज; मकाफात- प्रतिकार

मकानात-मकान (ब ब )

खराबात=मयखाना

अशनिपात=वज्रपात\

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by Kalipad Prasad Mandal on December 24, 2017 at 8:47pm

आ समर कबीर साहिब आदाब , जी एडिट कर देता हूँ |

Comment by Samar kabeer on December 24, 2017 at 3:04pm

जनाब कालीपद प्रसाद जी आदाब, इस ग़ज़ल को ऐडिट करें,और अर्थ अंत में लिखें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 24, 2017 at 1:30pm

आ. भाई कालीपद जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by Kalipad Prasad Mandal on December 24, 2017 at 11:23am

आ मोहम्मद आरिफ जी आदाब , मैं शब्दार्थ आखिर में ही लिखता था , मैंने सोचा साथ में लिखने सी पढने में आसानी होगी |  खैर ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति के लिए तहे दिल से शुक्रिया 

Comment by Mohammed Arif on December 24, 2017 at 8:01am

आदरणीय कालीपद प्रसाद जी आदाब,

                                  सामयिक शे'र से भरपूर बेहतरीन ग़ज़ल । दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए । शब्दार्थ आपको ग़ज़ल समाप्ति उपरांत लिखने थे । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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