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कुण्डलियाँ

१.
मिलना-जुलना जान लो,है रिश्तों को खाद
स्नेह-मिलन होता रहे,चखें नेह का स्वाद
चखें नेह का स्वाद,बात औरों की जानें
करकें बातें चार,स्वयं को अच्छा मानें
'सतविंदर' इस स्नेह,की न हो सकती तुलना
पनपें एक्य विचार,रहे यदि मिलना-जुलना।।

२.
समरथ हैं बस देवता,सच्चे रचनाकार
गीत गजल संगीत के,हैं अच्छे फ़नकार
हैं अच्छे फ़नकार,रचें नित न्यारी माया
इनका हर सद्कर्म, ज़माने को है भाया
'सतविंदर' कविराय,करो न प्रयास भगीरथ
वाणी दे आशीष,बनोगे तुम भी।। समरथ

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 20, 2018 at 9:30pm

आदरणीय विजय निकोर सर उत्साहवर्धन के लिए सादर हार्दिक आभार

Comment by vijay nikore on January 18, 2018 at 8:36am

सुन्दर छ्न्द लिखे हैं। हार्दिक बधाई।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 17, 2018 at 9:33pm

आदरणीय नरेंद्र सिंह चौहान जी उत्साहवर्धन के लिए सादर हार्दिक आभार

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 17, 2018 at 9:31pm

आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी उत्साहवर्धन के लिए सादर हार्दिक आभार

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 17, 2018 at 9:30pm

अनुमोदन एवं प्रोत्साहन के लिए सादर आभार संग नमन आदरणीय समर कबीर जी

Comment by narendrasinh chauhan on January 16, 2018 at 6:00pm

खूब सुन्दर रचना 

Comment by Mohammed Arif on January 16, 2018 at 1:01pm

आदरणीय सतविंद्र कुमार जी आदाब,

                               बहुत ही सामयिक कुंडलियाँ लगी । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Samar kabeer on January 15, 2018 at 3:19pm

जनाब सतविन्द्र कुमार जी आदाब,बढ़िया कुण्डलिया छन्द लिखे,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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