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ग़ज़ल ( दूर माशूक़ से आशिक़ कहाँ जाना चाहे )

(फाइलातुन -फइलातुन- फइलातुन-फेलुन )

दूर माशूक़ से आशिक़ कहाँ जाना चाहे |
कूचये यार में वो अपना ठिकाना चाहे |

मैं ही आया हूँ नहीं सिर्फ़ परखने क़िस्मत
उन को तो अपना हर इक शख्स बनाना चाहे |

थाम के हाथ जो देता हो हमेशा धोका
कौन उस शख्स से फिर हाथ मिलाना चाहे |

फितरते शमअ जलाना है तअज्जुब है मगर
जान परवाना वहाँ फिर भी लुटाना चाहे |

मुफ़लिसी के हैं यह मारे हुए ज़ालिम वरना
तेरी दहलीज़ पे सर कौन झुकाना चाहे |

दरमियाँ अपने रहे दोस्ती यूँ ही क़ायम
मेरे महबूब भला कब यह ज़माना चाहे |

हर नज़र मुझ पे ही तस्दीक़ लगी है वरना
उनके चहरे से नज़र कौन हटाना चाहे |

(मौलिक व अप्रकाशित )

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 14, 2018 at 6:23pm

जनाब राम अवध साहिब ,ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 14, 2018 at 6:22pm

जनाब नीरज साहिब ,ग़ज़ल को पसंद करने और आपकी हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on February 14, 2018 at 5:30pm

हर शेर खूबसूरत क्या खूब ग़ज़ल है।

मुबारकबाद कुबूल फरमायें।

Comment by Neeraj Nishchal on February 14, 2018 at 11:00am

ओह्ह क्या बात है आदरणीय tasdiq भाई आखिरी शेर ने बहुत ही कातिल है कितनी दाद दूँ समझ नही आता ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 14, 2018 at 10:22am

मुहतरम जनाब विजय साहिब ,आपकी खूबसूरत प्रतिक्रिया ,और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 14, 2018 at 10:21am

जनाब सलीम रज़ा साहिब ,ग़ज़ल में आपकी सुन्दर प्रतिक्रिया ,शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 14, 2018 at 10:19am

जनाब लक्ष्मण धामी साहिब ,आपकी ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया।

Comment by vijay nikore on February 14, 2018 at 9:55am

 //मुफ़लिसी के हैं यह मारे हुए ज़ालिम वरना 
तेरी दहलीज़ पे सर कौन झुकाना चाहे |//

भाई तस्दीक अहमद जी, गज़ल बार-बार पढ़ी... दिल से बधाई। 

Comment by SALIM RAZA REWA on February 14, 2018 at 12:07am

मैं ही आया हूँ नहीं सिर्फ़ परखने क़िस्मत
उन को तो अपना हर इक शख्स बनाना चाहे |.... वाह 

Comment by SALIM RAZA REWA on February 14, 2018 at 12:06am

वाह वाह मुरस्सा ग़ज़ल...  हुई है जनाब तस्दीक साहब  वाह वाह क्या कहने हर शेर के लिए मुबारक़बाद.. 

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