विहग निज चोंच में देखो,,,,,,
विहग निज चोंच में देखो, अहा! मछली दबोचे है|
फँसी खग कंठ में मछली, पड़े तन पर खरोंचे हैं ||
विहग औ मीन दोनों इक, सरीखे ही अबोले हैं |
मगर इक हर्ष दूजी भय, सँजोये आँख बोले हैं |१ |
उदर की भूख मिट जाए, यही चाहत विहग पाले |
वहीं पर मीन के देखो, पड़े हैं जान के लाले ||
सलामत जान की अपने, खुदा से चाहती मछली |
निवाला छूट ना जाए, यही मन सोचती बगुली |२ |
मौलिक और अप्रकाशित
-सत्यनारायण सिंह
Comment
बहुत खूब
आदरणीय सत्यनारायण जी आदाब,
बहुत ही सुंदर रचना । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । काश! विधा का नाम भी लिख दिया होता ।
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