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ऐ ज़माने अब चला ऐसी हवा (गैर मुरद्दफ़)

गैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल

2122 2122 212

*****†

ऐ ज़माने अब चला ऐसी हवा ,
लौट कर आये महब्बत में वफ़ा ।

दूरियाँ मिटती नहीं अब क्या करें,
कोई मिलने का निकालो रास्ता ।

चिलचिलाती धूप में आना सनम,
गुदगुदाती है तुम्हारी ये अदा ।

ज़ख्म दिल के देखकर रोते हैं हम,
याद आये इश्क़ का वो सिलसिला ।

तज्रिबा इतना है सूरत देख कर,
ये बता देते हैं कितना है नशा ।

वो लकीरों में था मेरे हाथ की,
मैं ज़माने में उसे ढूँढा किया ।

अश्क़ हमको दरबदर करते रहे,
जब तलक़ था दरमियाँ ये फ़ासला ।

दिल के अरमाँ छू रहे हैं अर्श अब,
आपने जब से दिया है हौंसला ।

वो रकीबों में उलझ कर रह गए,
बेगुनाही की मुझे देकर सज़ा ।

*****

मौलिक व अप्रकाशित

--हर्ष महाजन

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Comment

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Comment by Harash Mahajan on April 28, 2018 at 7:27am

आदरणीय ब्रजेश कुमार जी 

आपकी आमद और प्रोत्साहित 

टिप्पणी का शुक्रिया ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 18, 2018 at 8:11pm

उम्दा ग़ज़ल हुई आदरणीय..सादर

Comment by Harash Mahajan on April 17, 2018 at 10:15pm

शुक्रिया सर शंका दूर करने के लिए  आ० समर जी।

सादर ।

Comment by Samar kabeer on April 17, 2018 at 10:01pm

तज्रिबा इत/फ़ाइलातुन2122,(तज्रिबा 212)

ना है सूरत /फ़ाइलातुन2122,मात्रा पतन के साथ

देख कर/फाइलुन 212

सही शब्द 'तज्रिबा' है "तज़र्बा" नहीं ।

बाक़ी ठीक है ।

Comment by Harash Mahajan on April 17, 2018 at 7:48pm

आ० समर जी ....आपकी रहनुमाई में ये ग्सल यूँ हुई सर

ज़रा देखिएगा ।

सादर

ऐ ज़माने अब चला ऐसी हवा ,
लौट कर आये महब्बत में वफ़ा ।

दूरियाँ मिटती नहीं अब क्या करें,
कोई मिलने का निकालो रास्ता ।

चिलचिलाती धूप में आना सनम,
गुदगुदाती है तुम्हारी ये अदा ।

ज़ख्म दिल के देखकर रोते हैं हम,
याद आये इश्क़ का वो सिलसिला ।

है तज़र्बा इतना सूरत देख कर,
ये बता देते हैं कितना है नशा ।

वो लकीरों में था मेरे हाथ की,
मैं ज़माने में उसे ढूँढा किया ।

अश्क़ हमको दरबदर करते रहे,
जब तलक़ था दरमियाँ ये फ़ासला ।

दिल के अरमाँ छू रहे हैं अर्श अब,
आपने जब से दिया है हौंसला ।

वो रकीबों में उलझ कर रह गए,
बेगुनाही की मुझे देकर सज़ा ।

*****

Comment by Harash Mahajan on April 17, 2018 at 6:30pm

आ० समर जी .....

"तज्रिबा इतना है सूरत देख कर'

इसमें लफ्ज़ "तज्रिबा" या तज़र्बा 

इनकी तकती 

तज्रिबा=त/1ज्रि/2बा/2

तज़र्बा = त/1/ज़/2र्बा /2

122

सादर ।

Comment by Harash Mahajan on April 17, 2018 at 3:43pm

आदरणीय समर सर आदाब । सर आपका मार्गदर्शन सही दिशा दे रहा है । आपकी इस्लाह से ये निखार रहा गया । अभी और वक़्त देता हूँ । 

इसे फिर से लेकर आता हूँ सर ।

सादर ।

Comment by Samar kabeer on April 17, 2018 at 2:37pm

जनाब हर्ष महाजन जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,लेकिन ग़ज़ल अभी समय चाहती है,बहरहाल इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

कुछ सुझाव हैं,देखियेग ।

मतले का ऊला मिसरा यूँ कर लें :-

'ऐ ज़माने अब चला ऐसी हवा'

दूसरा शैर स्पष्ट नहीं है,सानी मिसरा यूँ कर लें :-

'कोई मिलने का निकालो रास्ता'

चौथा शैर के भाव स्पष्ट नहीं,शिल्प भी कमज़ोर है, व्याकरण दोष भी है, इसे ग़ज़ल से ख़ारिज करना बहतर होगा ।

छटे शैर का ऊला मिसरा यूँ कर लें :-

'तज्रिबा इतना है सूरत देख कर'

सातवें शैर का सानी मिसरा यूँ कर लें :-

'मैं ज़माने में उसे ढूंढा किया'

आठवां शैर यूँ करें :-

'अश्क हमको दर ब दर करते रहे

जब तलक था  दरमियाँ ये फ़ासला'

9वें शैर का सानी मिसरा यूँ कर लें :-

'आपने जबसे दिया है हौसला'

आख़री शैर का सानी मिसरा यूँ करें :-

'बे गुनाही की मुझे देकर सज़ा'

कृपया ध्यान दे...

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