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लल्ला गया विदेश

© बसंत कुमार शर्मा

उसको जब अपनी धरती का,

जमा नहीं परिवेश.

ताक रही दरवाजा अम्मा,

लल्ला गया  विदेश.

खेत मढैया बिका सभी कुछ,

हैं जेबें खाली.

बैठी चकिया पीस रही है,

घर छोटी लाली.

बिना फीस के विद्यालय में,

मिला न उसे प्रवेश

नई बहुरिया आई घर में,

स्वप्न नये पाले.

दिखे यहाँ तो हर कोने में,

मकड़ी के जाले.

जाने कैसे कब सुलझेंगे,

उलझ गए जो केश

बुधिया के हुक्के की गुड़गुड़,

कहे कथा न्यारी.

कौन समझ पाया है उसकी,

क्या है बीमारी.

सूखी हुई पसुरियाँ दिखतीं,   

नरकंकाली वेश.

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 19, 2018 at 9:19am

आदरणीय   बृजेश कुमार 'ब्रज'  जी आपका ह्रदय से आभार 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 19, 2018 at 9:19am

आदरणीय  Nilesh Shevgaonkar  जी आपका ह्रदय से आभार 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 19, 2018 at 9:19am

आदरणीय Shyam Narain Verma जी आपका ह्रदय से आभार 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 19, 2018 at 9:18am

आदरणीय Shyam Narain Verma  जी आपका ह्रदय से आभार 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 19, 2018 at 9:17am

आदरणीया Neelam Upadhyaya  जी आपका ह्रदय से आभार 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 18, 2018 at 8:30pm

वाह क्या खूब गीत रचा है आदरणीय शर्मा जी..बहुत सुन्दर

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 18, 2018 at 8:06pm

आ.  बसंत जी,
एक और उम्दा गीत हुआ है ..ईश्वर आप की लेखनी को यूँ ही समृद्ध   करता रहे 
सादर 

Comment by Shyam Narain Verma on April 18, 2018 at 1:42pm
बहुत सुन्दर मनभावन गीत .. बधाई 
Comment by Neelam Upadhyaya on April 18, 2018 at 10:56am

आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी, नमस्कार । बढ़िया कविता हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 18, 2018 at 8:32am

आदरणीयSamar kabeer जी बहुत बहुत आभार दिल से आपका  

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