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विचार-मंथन के सागर में (अतुकान्त कविता)

"लोकतंत्र ख़तरे में है!
कहां
इस राष्ट्र में
या
उस मुल्क में!
या
उन सभी देशों में
जहां वह किसी तरह है!
या जो कि
कठपुतली बन गया है
तथाकथित विकसितों के मायाजाल में,
तकनीकी, वैज्ञानिकी विकास में! या
ब्लैकमेलिंग- व्यवसाय में!
धरातल, स्तंभों से दूर हो कर
खो सा गया है
कहीं आसमान में!
दिवास्वप्नों की आंधियों में,
अजीबोग़रीब अनुसंधानों में!


"इंसानियत ख़तरे में है!
कहां
इस मुल्क में
या
उस राष्ट्र में!
या
उन सभी देशों में
जहां वह किसी तरह है!
या जो कि
कठपुतली बन गयी है
शैतानों के मायाजाल में!
कुसंस्कारों, भ्रष्टाचरणों के विकास में!
धार्मिक-स्तंभों, तहज़ीब से दूर हो कर
बस रो रही है निरंतर
आत्मा संग
कहीं
निर्जीव से मानव-शरीर में!
या
धार्मिक-साहित्यिक किताबों में,
विभिन्न विधाओं में!
ताल्लुक है दोनों का
ज़मीनी हक़ीक़तों में!
दुनियावी हालात में
इंसानियत और लोकतंत्र
के द्वंद्व में!
विचार-मंथन के सागर में!

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 22, 2018 at 3:59pm

रचना के संदेश तक पाठकीय दृष्टिकोण और अनुमोदन के साथ हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब हर्ष महाजन साहिब।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 22, 2018 at 3:58pm

सुधार इस्लाह के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब।

Comment by Samar kabeer on April 22, 2018 at 9:50am

जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,बहुत गम्भीर विषय पर अच्छी अतुकान्त कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'ताल्लुक' को "तअल्लुक़" कर लें ।

Comment by Harash Mahajan on April 22, 2018 at 9:25am

अति सुंदर अतुकांत सृजन आदरणीय शेख साहब ।

लोकतंत्र हो या इंसानियत सब खतरे में......

दिली दाद वसूल पाइयेगा ।

सादर ।

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