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देखा, अनदेखा देखा! (लघुकथा) :

17 अप्रैल, 2017 (मंगलवार) [रात नौ बजे]

डियर डायरी!


आज भी मैंने जो कहा-अनकहा सुना था, वैसा ही पाया और देखा भी, अपने इर्द-गिर्द, अपने घर में, समाज और परिवार में ही नहीं‌, पूरे देश और दुनिया में भी! कथनी और करनी में अंतर! एक से बढ़कर एक फेंकू! बदला लेने के पारम्परिक, ग़ैर-पारम्परिक और आधुनिक तौर-तरीक़े! बदलती हवायें, परिभाषाएं, अवसरवादिता और रीति-रिवाज़! रिश्तों की नीरसता और उनकी पोल! मशीनी आदमी का रमण-अमन-दमन-चलन और प्रकरण ! ख़रीद-फ़रोख़्त!  आधुनिक बड़प्पन और बोनापन! खुशियों का व्यापारीकरण या ख़शियों के पेड़ की बोनसाई प्रजाति की तथाकथित रिश्तेदारी से ख़ुश होते लोग!


मुआफ़ करना! मुआ अपने को ज़माने के हिसाब से नहीं बदल पा रहा या यूं कहूं कि नहीं बदल सकता! सच तो यह है कि ऐसा या वैसा बनना या होना मैं चाहता ही नहीं! कहते हैं कि सब कुछ बदल रहा है? कैसे? जो अपेक्षित था, वह बदलाव या जो अनपेक्षित था, वह? लगता है कि द्रुत प्रगति के चक्कर में सब कुछ बिक रहा है अपेक्षित और अनपेक्षित भी! ईमान और बेईमान भी! अपने और पराये भी! अपना और पराया भी! इंसान, शैतान और हैवान भी!


सुना था कि मशीनें भी कठपुतली हुआ करतीं हैं, लेकिन सजीव मशीनें भी इतनी स्मार्ट कठपुतलियां हो जाया करती हैं! आज मैंने भी देखा जो अब तक न देखा और मेरे तीसरे नेत्र ने अनदेखा भी देखा!


शेष फिर लिखूंगा, यदि बहुरूपिए, बहुआयामी प्रदूषण में ज़िंदा बच सका, तो! लिखने को प्रेरित किया गया, तो! किसी तरह का बेन थोपा गया, तो भी!

तुम्हारा अभिन्न
अभिलाष

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 18, 2018 at 8:53pm

मेरी इस रचना पर भी आपकी त्वरित टिप्पणी, आश्वासन, अनुमोदन और हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीया नीलम उपाध्याय जी और आदरणीय समर कबीर जी

Comment by Samar kabeer on April 18, 2018 at 2:47pm

जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,बहुत ख़ूब वाह, उम्दा लघुकथा,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Neelam Upadhyaya on April 18, 2018 at 11:15am

आदरणीय उसमानी जी, नमस्कार । बहुआयामी प्रदूषण आपका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा, ऐसा विश्वास है । बढ़िया लघुकथा । प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई ।

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