सोने की बरसात करेगा
सूरज जब इफ़रात करेगा
बादल पानी बरसाएंगे
राजा जब ख़ैरात करेगा
जो पहले भी दोस्त नहीं था
वो तो फिर से घात करेगा
कुर्सी की चाहत में फिर वो
गड़बड़ कुछ हालात करेगा
जो संवेदनशील नहीं वो
फिर घायल जज़्बात करेगा
जो थोड़ा दीवाना है वो
अक्सर हक़ की बात करेगा
नंद कुमार सनमुखानी.
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"मौलिक और अप्रकाशित"
Comment
जनाब नंद कुमार सनमुखवानी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
'सूरज जब इफ़रात करेगा'
इस मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर देखिये,दूसरी बात ये कि क़ाफ़िया दोष भी है, आपने ग़ज़ल में 'ते'"त" के क़वाफ़ी लिये हैं लेकिन "इफ़रात" लफ़्ज़ "तोय"पर ख़त्म होता हैं, ग़ौर कीजियेगा ।
'जो पहले भी दोस्त नहीं था
वो तो फिर से घात करेगा'
इस शे'र में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ है, देखियेगा ।
इस शे'र पर जनाब निलेश साहिब ने जो इंगित किया है,वो दुरुस्त है, लेकिन आपने जो तर्क दिया है,वो आपकी सोच के हिसाब से ठीक लगता है,क्योंकि आप शाइर की नज़र से देख रहे हैं,पाठक की नज़र से देखने पर,वो भाव उजागर नहीं हो रहे हैं, 'दोस्त' की जगह "दुश्मन" ही क्यों नहीं कह देते?
उर्दू शाइरी में "दोस्त" को भी दुश्मन कहा जाता रहा है,मिसाल के तौर पर:-
'दोस्त होता है जान का दुश्मन
वक़्त जब बेबसी का आता है'
'दिल अभी पूरी तरह टूटा नहीं
दोस्तों की मह्रबानी चाहिये'
"हुए तुम दोस्त जिसके दुश्मन उसका आसमाँ क्यों हो'
इस तनाज़ुर में मेरे नज़दीक शे'र का मफ़हूम साफ़ है,लेकिन आम पाठक इतनी गहराई से नहीं सोचता ।
ग़ज़ल के चार अशआर में 'वो' शब्द खटकता है, इससे बचा जा सकता था ।
आ. नन्द कुमार जी,
//जो पहले भी दोस्त नहीं था// में कहीं इशारा दिखाई नहीं देता है शत्रुता का ..
आप मेरे दोस्त नहीं हैं अत: आप शत्रु मान लूँ यह ठीक न लगा मुझे..
आप अन्यथा न लें
सादर
आ. नंदकुमार जी,
इस ग़ज़ल के लिए बधाई ..ग़ज़ल भावों को समेटने में सफल हुई है लेकिन अक्सर शेर एक ही तरकीब के हैं ..
जो पहले भी दोस्त नहीं था
वो तो फिर से घात करेगा.. इस शेर का भाव पक्ष कमज़ोर है...इस लिहाज से कि यह तय मान लिया गया है कि जो दोस्त नहीं है वह दुश्मन ही होगा...सोचियेगा
सादर
हार्दिक बधाई आदरणीय नंद कुमार जी।बेहतरीन गज़ल।
जो पहले भी दोस्त नहीं था
वो तो फिर से घात करेगा
कुर्सी की चाहत में फिर वो
गड़बड़ कुछ हालात करेगा
बहुत खूब ! इस सुंदर गजल हेतु बधाई स्वीकारें । |
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