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मैं लिख नहीं सकता l

मैं लिख नहीं सकता 

वाणी के पर खोलकर

अम्बुधि के उर्मिल प्रवाह पर

उत्कंठित भावभंगिमा से

नीरवता का भेदन करके

घन तिमिर बीच में बन प्रभा

मधुकरी सदृश गुंजित रव से

अविरल नूतनता भर देता

मैं लिख नहीं सकता l

भू अनिल अनल में 

उथल पुथल 

अनृत प्रवाद का मर्दन कर 

इतिवृत्तहीन विपुल गाथा

मुख अवयव से 

पुष्कल निनाद

हो अनवरुद्ध

झंकृत करता 

मैं लिख नहीं सकता l

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 406

Comment

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Comment by Neelam Upadhyaya on April 26, 2018 at 12:09pm
बहुत ही सुन्दर कविता हुई है छोटेलाल जी। बधाई स्वीकार करें।
Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on April 26, 2018 at 9:01am
आदरणीय विजय निकोर जी सादर अभिवादन आपने कविता को मान दिया मैं आपको मान दे रहा हूँ बहुत बहुत आभार
Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on April 26, 2018 at 8:59am
आदरणीय सुशील सरना जी सादर अभिवादन आपके उत्साह वर्धन से मन प्रसन्न हुआ लेखनी सफल हुई दिल से धन्यवाद
Comment by vijay nikore on April 26, 2018 at 2:21am

इस सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई, आदरणीय छोटेलाल सिहं जी

Comment by Sushil Sarna on April 25, 2018 at 8:36pm

आदरणीय डॉ छोटेलाल जी आपने न लिख के भी सब कुछ लिख दिया। ... अति सुंदर ... शब्द सौंदर्य देखते ही बनता है। इस अति उत्तम प्रस्तुति के लिए दिल से बधाई।

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on April 25, 2018 at 7:48pm
आदरणीय समर साहब जी सादर अभिवादन आपके उत्साह वर्धन से मन प्रफुल्लित हुआ,लेखनी सार्थक हुई ,उत्साह वर्धन के लिये दिल से धन्यवाद
Comment by Samar kabeer on April 25, 2018 at 2:40pm

जनाब डॉ.छोटेलाल सिंह जी आदाब,बहुत बढ़िया अतुकान्त कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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