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ग़ज़ल (आज फैशन है)

1222 1222 1222 1222

लतीफ़ों में रिवाजों को भुनाना आज फैशन है,
छलावा दीन-ओ-मज़हब को बताना आज फैशन है।

ठगों ने हर तरह के रंग के चोले रखे पहने,
सुनहरे स्वप्न जन्नत के दिखाना आज फैशन है।

दबे सीने में जो शोले जमाने से रहें महफ़ूज़,
पराई आग में रोटी पकाना आज फैशन है।

कभी बेदर्द सड़कों पे न ऐ दिल दर्द को बतला,
हवा में आह-ए-मुफ़लिस को उड़ाना आज फैशन है।

रहे आबाद हरदम ही अना की बस्ती दिल पे रब,
किसी वीराँ जमीं पे हक़ जमाना आज फैशन है।

गली कूचों में बेचें ख्वाब अच्छे दिन के लीडर अब,
जहाँ मौक़ा लगे मज़मा लगाना आज फैशन है।

इबादत हुस्न की होती जहाँ थी देश भारत में,
नुमाइश हुस्न की करना कराना आज फैशन है।

नहीं उम्मीद औलादों से पालो इस जमाने में,
बड़े बूढ़ों के हक़ को बेच खाना आज फैशन है।

नहीं इतना भी गिरना चाहिए फिर से न उठ पाओ,
गिरें जो हैं उन्हें ज्यादा गिराना आज फैशन है।

तिज़ारत का नया नुस्ख़ा है लूटो जितनी मन मर्ज़ी,
'नमन' मज़बूरियों से धन कमाना आज फैशन है।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Naveen Mani Tripathi on May 6, 2018 at 4:32pm

आ0 नमन जी बहुत सुंदर ग़ज़ल । बधाई ।

Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on May 5, 2018 at 9:54am

आ0 हर्ष महाजन जी आपका हृदय से आभार।

Comment by Harash Mahajan on May 3, 2018 at 2:25pm

वाह बहुत ही खूब अहसास

पिरोये हैं आदरणीय वासुदेव जी

आपने इस कृति में । दाद हाज़िर है जनाब ।

सादर ।

Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on May 3, 2018 at 2:09pm

आ0 लक्ष्मण धामी जी आपका हॄदय तल से आभार।

Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on May 3, 2018 at 2:08pm

आ0 नीलेश जी ग़ज़ल को आपकी उत्साहवर्धन करती प्रतिक्रिया मिली हृदय से आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 3, 2018 at 1:26pm

आ. भाई बासुदेव जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 3, 2018 at 10:50am

आ. बासुदेब जी 
अच्छी ग़ज़ल हुई है .. बाक़ी सब समर सर कह ही चुके हैं...
ग़ज़ल के लिए बधाई 
सादर 

Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on May 2, 2018 at 7:05pm

आ0 मोहम्मद आरिफ जी ग़ज़ल में शिरकत और ग़ज़ल को दाद ओ तहसीन से नवाजने का तहे दिल से शुक्रिया।

Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on May 2, 2018 at 7:03pm

आ0 श्याम नरायण वर्मा जी आपका हॄदय से आभार।

Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on May 2, 2018 at 7:02pm

आ0 समर साहिब आपके अमूल्य सुझावों के लिए हृदय से आभार।

तीन अशआर में आवश्यक तब्दीलियाँ कर ग़ज़ल में संशोधन किया है।

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