For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल - हम अपने हिस्से का ही आसमान दे बैठे

बह्र - मफाइलुन फइलातुन मफाइलुन फैलुन

वो किस तरह से मुकरते ज़ुबान दे बैठे।
तभी कचहरी मे झूठा बयान दे बैठे।

तमाम दाग थे दामन में जिसके उसको ही
टिकट चुनाव का आला कमान दे बैठे।

दिखाया स्वर्ग का सपना हमें जो ब्राह्मण ने
तो दान में उसे अपना मकान दे बैठे।

जो बात करते थे कल राष्ट्र भक्ति का साहब,
वो चन्द सिक्कों में अपना ईमान दे बैठे।

जब उनके प्यार को माँ बाप ने नकार दिया,
नदी में डूब के वो अपनी जान दे बैठे।

रहमदिली का ये आलम रहा है अपना भी
हम अपने हिस्से का ही आसमान दे बैठे।

हम उनके दम पे भला कैसे जंग जीतेंगे,
जो दुश्मनों को ही तीरो कमान दे बैठे।

मौलिक अप्रकाशित

Views: 710

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on May 11, 2018 at 10:49pm

आदर्णीय तस्दीक़ अहमद खान साहब बहुत बहुत शूक्रिया।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on May 11, 2018 at 5:50pm

जनाब राम अवध साहिब , मिसरे की शुरुआत रहमदिल से करेंगे तो बह्र में नहीं होगा इसलिए उसे बीच में लेकर बह्र में किया है । सादर

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on May 11, 2018 at 2:24pm

आदर्णीय लक्ष्मण धामी मुसाफिर जी ग़ज़ल पसन्दगी एवं हौसलाअफजाई के लिये बहुत बहुत शुक्रिया।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on May 11, 2018 at 1:40pm

आदरणीय तस्दीक़ अहमद खान साहब आपके द्वारा दिये गये अमूल्य सुझाव के लिये बहुत बहुत धन्यवाद। शब्द ब्राहम्मण न होकर हिन्दी में शुद्ध शब्द ब्राह्मण है। इस प्रकार मेरे विचार से मिसरा बह्र में होना चाहिये। ईमान वाले शेर की जगह दूसरा शेर कहना शायद अधिक उचित रहेगा। 

क्या रहमदिली की जगह रहम दिली लिखने से मिसरा दुरुस्त हो जावेगा। 

शेर 7 में तकाबुले रदीफ का नगण्य दोष है। उचित सलाह के लिये पुन: धन्यवाद।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on May 11, 2018 at 1:21pm

आदरणीय समर कबीर साहब जी ग़ज़ल पर सार्थक टिप्पणी करने एवं उत्साहवर्धन के लिये सादर आभार 

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on May 11, 2018 at 1:19pm

आदरणीय श्री राम शिरोमणि पाठक जी ग़ज़ल पसन्दगी के लिये बहुत बहुत शूक्रिया

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 10, 2018 at 4:56am

आ. भाइ रामअवध जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on May 9, 2018 at 8:38pm

जनाब राम अवध साहिब ,अच्छी ग़ज़ल हुई है ,मुबारक बाद क़ुबूल फरमायें।

  1. जनाब नीलेश जी की बातों का संज्ञान ज़रूर लें ।शेर3 उला मिसरा बह्र में नहीं है , ब्राहम्मण की जगह पण्डित करके देखियेगा । शेर4 सानी मिसरे में ईमान की जगह अमान कर सकते हैं ।शेर6उला को यूं कर सकते हैं ।"हमारी रहम दिली का रहा है ये आलम"। शेर7 का उला यूँ कर सकते हैं ।"लड़ाई जीतेंगे हम उन के दम पे कैसे भला "। ---सादर
Comment by Samar kabeer on May 9, 2018 at 3:35pm

जनाब राम अवध जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें,शेष जनाब निलेश जी कह चुके हैं,उनकी बातों का संज्ञान लें ।

Comment by ram shiromani pathak on May 9, 2018 at 8:31am

बढ़िया तंज़ करती हुई ग़ज़ल आदरणीय।।दिली दाद

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन व आभार।"
13 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सुंदर सुझाव के लिए हार्दिक आभार।"
13 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"बेशक। सच कहा आपने।"
14 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"मेरा प्रयास आपको अच्छा और प्रेरक लगा। हार्दिक धन्यवाद हौसला अफ़ज़ाई हेतु आदरणीय मनन कुमार सिंह जी।"
14 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ नववर्ष की पहली गोष्ठी में मेरी रचना पर आपकी और जनाब मनन कुमार सिंह जी की टिप्पणियों और…"
14 hours ago
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"प्रेरक रचना।मार्ग दिखाती हुई भी। आज के समय की सच्चाई उजागर करती हुई। बधाइयाँ लीजिये, आदरणीय उस्मानी…"
15 hours ago
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"दिली आभार आदरणीया प्रतिभा जी। "
15 hours ago
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"हार्दिक आभार आदरणीय उस्मानी जी। "
15 hours ago
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"आजकल खूब हो रहा है ये चलन और कभी कभी विवाद भी। आपकी चिरपरिचित शैली में विचारोत्तेजक लघुकथा। बधाई…"
15 hours ago
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"समसामयिक विषय है ये। रियायत को ठुकराकर अपनी काबलियत से आगे बढ़ना अच्छा है,पर इतना स्वाभिमान कम ही…"
15 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"आदाब। हार्दिक स्वागत आदरणीय मनन कुमार सिंह जी। समसामयिक और सदाबहार विषय और मुद्दों पर सकारात्मक और…"
16 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"चाहतें (लघुकथा) : बार-बार मना करने पर भी 'इच्छा' ने अपनी सहेली 'तमन्ना' को…"
16 hours ago

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service