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ग़ज़ल - हम अपने हिस्से का ही आसमान दे बैठे

बह्र - मफाइलुन फइलातुन मफाइलुन फैलुन

वो किस तरह से मुकरते ज़ुबान दे बैठे।
तभी कचहरी मे झूठा बयान दे बैठे।

तमाम दाग थे दामन में जिसके उसको ही
टिकट चुनाव का आला कमान दे बैठे।

दिखाया स्वर्ग का सपना हमें जो ब्राह्मण ने
तो दान में उसे अपना मकान दे बैठे।

जो बात करते थे कल राष्ट्र भक्ति का साहब,
वो चन्द सिक्कों में अपना ईमान दे बैठे।

जब उनके प्यार को माँ बाप ने नकार दिया,
नदी में डूब के वो अपनी जान दे बैठे।

रहमदिली का ये आलम रहा है अपना भी
हम अपने हिस्से का ही आसमान दे बैठे।

हम उनके दम पे भला कैसे जंग जीतेंगे,
जो दुश्मनों को ही तीरो कमान दे बैठे।

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Ram Awadh VIshwakarma on May 11, 2018 at 10:49pm

आदर्णीय तस्दीक़ अहमद खान साहब बहुत बहुत शूक्रिया।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on May 11, 2018 at 5:50pm

जनाब राम अवध साहिब , मिसरे की शुरुआत रहमदिल से करेंगे तो बह्र में नहीं होगा इसलिए उसे बीच में लेकर बह्र में किया है । सादर

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on May 11, 2018 at 2:24pm

आदर्णीय लक्ष्मण धामी मुसाफिर जी ग़ज़ल पसन्दगी एवं हौसलाअफजाई के लिये बहुत बहुत शुक्रिया।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on May 11, 2018 at 1:40pm

आदरणीय तस्दीक़ अहमद खान साहब आपके द्वारा दिये गये अमूल्य सुझाव के लिये बहुत बहुत धन्यवाद। शब्द ब्राहम्मण न होकर हिन्दी में शुद्ध शब्द ब्राह्मण है। इस प्रकार मेरे विचार से मिसरा बह्र में होना चाहिये। ईमान वाले शेर की जगह दूसरा शेर कहना शायद अधिक उचित रहेगा। 

क्या रहमदिली की जगह रहम दिली लिखने से मिसरा दुरुस्त हो जावेगा। 

शेर 7 में तकाबुले रदीफ का नगण्य दोष है। उचित सलाह के लिये पुन: धन्यवाद।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on May 11, 2018 at 1:21pm

आदरणीय समर कबीर साहब जी ग़ज़ल पर सार्थक टिप्पणी करने एवं उत्साहवर्धन के लिये सादर आभार 

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on May 11, 2018 at 1:19pm

आदरणीय श्री राम शिरोमणि पाठक जी ग़ज़ल पसन्दगी के लिये बहुत बहुत शूक्रिया

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 10, 2018 at 4:56am

आ. भाइ रामअवध जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on May 9, 2018 at 8:38pm

जनाब राम अवध साहिब ,अच्छी ग़ज़ल हुई है ,मुबारक बाद क़ुबूल फरमायें।

  1. जनाब नीलेश जी की बातों का संज्ञान ज़रूर लें ।शेर3 उला मिसरा बह्र में नहीं है , ब्राहम्मण की जगह पण्डित करके देखियेगा । शेर4 सानी मिसरे में ईमान की जगह अमान कर सकते हैं ।शेर6उला को यूं कर सकते हैं ।"हमारी रहम दिली का रहा है ये आलम"। शेर7 का उला यूँ कर सकते हैं ।"लड़ाई जीतेंगे हम उन के दम पे कैसे भला "। ---सादर
Comment by Samar kabeer on May 9, 2018 at 3:35pm

जनाब राम अवध जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें,शेष जनाब निलेश जी कह चुके हैं,उनकी बातों का संज्ञान लें ।

Comment by ram shiromani pathak on May 9, 2018 at 8:31am

बढ़िया तंज़ करती हुई ग़ज़ल आदरणीय।।दिली दाद

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