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डूब गए ...

तिमिर
गहराने लगा
एक ख़ामोशी
सांसें लेने लगी
तेरे अंदर भी
मेरे अंदर भी


तैर रहे थे
निष्पंद से
कुछ स्पर्श
तेरे अंदर भी
मेरे अंदर भी


सुलग रहे थे
कुछ अलाव
चाहतों की
अदृश्य मुंडेरों पर
तेरे अंदर भी
मेरे अंदर भी


डूब गए
कई जज़ीरे
ख़्वाबों के
खामोश से तूफ़ान में
तेरे अंदर भी
मेरे अंदर भी

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on May 14, 2018 at 3:46pm

आदरणीय समर कबीर साहिब , आदाब ... सृजन आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया का दिल से आभारी है।

Comment by Samar kabeer on May 10, 2018 at 11:22am

जनाब सुशील सरना जी आदाब,हमेशा की तरह सुंदर और प्रभावशाली कविता,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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