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2122 1212 22

यूँ    दुपट्टा    बहुत    उड़ा   कोई ।
जाने   कैसी   चली   हवा   कोई ।।

उम्र  भर  हुस्न  की सियासत से ।
बे   मुरव्वत   छला  गया   कोई ।।

याद उसकी चुभा  गयी  नस्तर ।
दर्द   से   रात भर  जगा  कोई।।

ख़्वाहिशें इस क़दर थीं बेक़ाबू ।
फिर  नज़र  से उतर  गया  कोई ।।

वो सँवर कर गली से निकला है ।
ढूढ़ता   है  जो   हमनवा  कोई ।।

प्यार  पहला ज़रूर  था  उसका ।
मुद्दतों  बाद  तक   मिला  कोई ।।

इस  तरह  बेनक़ाब निकलें  मत ।
हो  रहा आप  पर  फ़िदा  कोई ।।

लोग   गिरने   पे   मुस्कुराते  हैं ।
रह  गयी अब  कहाँ  हया कोई ।।

टूटने   का    था  इंतज़ार   उन्हें ।
सांस  देकर   गयी   दुआ  कोई ।।

यूँ तसव्वुर  में डूबकर  शब  भर ।
नज़्म  में  आपको  लिखा  कोई ।।

हुस्न  पर  छा  रही  अना  तब से ।
जब  से  देखा  है आइना   कोई ।।

        ---नवीन मणि त्रिपाठी 
        मौलिक अप्रकाशित























































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Comment by gumnaam pithoragarhi on June 5, 2018 at 10:04pm
अच्छी ग़ज़ल हुई है बधाई,,,,,,
Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 2, 2018 at 1:27pm

एक से बढ़कर एक शेर , आनंद आ गया आदरणीय, बहुत बहुत बधाई आपको 

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 2, 2018 at 11:35am

हार्दिक  आभार आ0 श्याम नारायण वर्मा जी 

Comment by Shyam Narain Verma on June 2, 2018 at 10:21am
बहुत खूब , पूरी ग़ज़ल बहुत उम्दा है , बहुत बहुत बधाई, सादर ,

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