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मुद्दतों के बाद उल्फ़त में इज़ाफ़त सी लगी

। आज फिर उसकी अदा मुझको इनायत सी लगी ।।

हुस्न में बसता है रब यह बात राहत सी लगी ।

आप पर ठहरी नज़र कुछ तो इबादत सी लगी ।।

क़त्ल का तंजीम से जारी हुआ फ़तवा मगर

। हौसलों से जिंदगी अब तक सलामत सी लगी ।।

बारहा लिखता रहा जो ख़त में सारी तुहमतें ।

उम्र भर की आशिक़ी उसको शिक़ायत सी लगी ।।

मुस्कुरा कर और फिर परदे में जाना आपका ।

बस यही हरकत ज़माने को शरारत सी लगी ।।

दे दिया था जब खुदा ने हुस्न की दौलत तमाम ।

आपके लहजे में क्यूँ सबको किफ़ायत सी लगी ।।

दफ़अतन खामोश होकर वो तेरी नाराजगी।

वस्ल की वो रात भी मुझको कयामत सी लगी ।।

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Naveen Mani Tripathi on June 10, 2018 at 4:36pm

आ0 श्याम नारायण वर्मा जी सादर आभार 

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 10, 2018 at 4:35pm

भाई सुशील शरण जी सादर आभार 

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 10, 2018 at 4:20pm

आ0 सतविंदर कुमार राना जी आभार । दौलत का प्रयोग स्त्री लिंग के रूप में ही प्रयोग हुआ है ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 10, 2018 at 4:18pm

भाई गुमनाम पिथौरा गढ़ी साहब शुक्रियः । सुझाव का स्वागत है । जगी लगी तकाबुल ए रदीफ़ दोष कहलाता है पर अगर जरूरी लगे तो मान्य भी होता है । 

मुस्कुराना की सलाह जायज है ।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on June 10, 2018 at 1:45pm

बहुत खूब..

दौलत शायद स्त्रीलिंग शब्द है. सादर

Comment by gumnaam pithoragarhi on June 5, 2018 at 9:58pm
वाह अच्छी ग़ज़ल हुई है.... कुछ सुझाव बुरा न माने....मुस्कुरा कर ,,,,के स्थान पर,,,,मुस्कुराना,,,, करके देखिए शायद कुछ ठीक लगे...आखरी शेर में ,,,,,,जगी-लगी ..दोष है सुधार हो सकता है बाकी गुणीजन कुछ जरूर कहेंगे ...
Comment by Sushil Sarna on June 5, 2018 at 4:51pm

मुद्दतों के बाद उल्फ़त में इज़ाफ़त सी लगी

। आज फिर उसकी अदा मुझको इनायत सी लगी ।।

हुस्न में बसता है रब यह बात राहत सी लगी ।

आप पर ठहरी नज़र कुछ तो इबादत सी लगी ।।


वाह शानदार अहसास सर .... हार्दिक बधाई सर

Comment by Shyam Narain Verma on June 5, 2018 at 4:26pm
इस शानदार ग़ज़ल के लिए दिल से बधाईयाँ 

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