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2122 2122 212
लोग कब दिल से यहाँ बेहतर मिले ।
जब मिले तब फ़ासला रखकर मिले ।।

है अजब बस्ती अमीरों की यहां ।
हर मकाँ में लोग तो बेघर मिले ।।

तज्रिबा मुझको है सापों का बहुत ।
डस गये जो नाग सब झुककर मिले ।।

कर गए खारिज़ मेरी पहचान को ।
जो तसव्वुर में मुझे शबभर मिले ।।

मैं शराफ़त की डगर पर जब चला ।
हर कदम पर उम्र भर पत्थर मिले ।।

मौत से डरना मुनासिब है नहीं ।
क्या पता फिर जिंदगी बेहतर मिले ।।

भुखमरी के दौर से गुजरे हैं वो ।
खेत सारे गाँव के बंजर मिले ।।

आप से उम्मीद अच्छे दिन की थी ।
हाथ में क्यों आपके ख़ंजर मिले ।।

है बहुत इल्ज़ाम उन पर आपका ।
आप भी उनसे कहाँ कमतर मिले ।।

सिर्फ दौलत तक नज़र सबकी रही ।
अब तलक भी जो हमें रहबर मिले ।।

जब भी माँगा पांच सालों का हिसाब ।
आपके बदले हुए तेवर मिले ।।


--- नवीन मणि त्रिपाठी

मौलिक अप्रकाशित

Views: 773

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on June 10, 2018 at 1:54pm

बेहतरीन गजल हुई है.. हार्दिक बधाई 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 9, 2018 at 2:42pm

वाह वाह आदरणीय त्रिपाठी जी सुन्दर सरस ग़ज़ल कही है..

Comment by narendrasinh chauhan on June 9, 2018 at 11:38am
बहोत सुन्दर रचना
Comment by Naveen Mani Tripathi on June 9, 2018 at 8:41am

आ0 रक्षिता सिंह जी सादर आभार 

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 9, 2018 at 8:41am

आ0 गंगा धर शर्मा साहब सादर आभार 

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 9, 2018 at 8:40am

आ0 बसंत कुमार शर्मा जी सादर आभार

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 9, 2018 at 8:39am

आ0 श्याम नारायण वर्मा जी हार्दिक आभार 

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 9, 2018 at 8:38am

आ0 रवी शुक्ला जी सप्रेम आभार 

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 9, 2018 at 8:37am

आ0 तेजवीर सिंह साहब सादर आभार 

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 9, 2018 at 8:37am

आ0 लक्ष्मण धामीसाहब सादर आभार 

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