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जरूरत नहीं अब तेरी रहमतों की ।

हमें भी पता है डगर मंजिलों की ।।

है फ़ितरत हमारी बुलन्दी पे जाना ।

बहुत नींव गहरी यहाँ हौसलों की ।।

अदालत में अर्जी लगी थी हमारी ।

मग़र खो गयी इल्तिज़ा फैसलों की ।।

भटकती रहीं ख़्वाहिशें उम्र भर तक ।

दुआ कुछ रही इस तरह रहबरों की ।।

उन्हें जब हरम से मुहब्बत हुई तो ।

सदाएं बुलाती रहीं घुघरुओं की ।।

न उम्मीद रखिये वो गम बाँट लेंगे ।

यहाँ फ़िक्र किसको रही आंसुओं की ।।

चुनौती अंधेरों से जब भी मिली तो ।

लगी कीमती रौशनी जुगनुओं की ।।

नदारद तबस्सुम है चेहरों से सबके ।

है तादात लम्बी यहां गमजदों की ।।

कहीं खो गयी आज इंसानियत फिर।

खबर ही नहीं आदमी को हदों की ।।

बिछे हैं यहां दागियों की डगर में ।

ये ख्वाहिश नहीं थी चमन के गुलों की ।।

नवीन मणि त्रिपाठी

मौलिक अप्रकाशित 

Views: 727

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Comment by Naveen Mani Tripathi on June 11, 2018 at 10:01pm

आ0 महेंद्र कुमार साहब आभार 

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 11, 2018 at 9:55pm

आ0 ब्रजेश कुमार ब्रज जी सादर आभार

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 11, 2018 at 9:46pm

आ0 नीलम उपाध्याय जी सादर नमन 

Comment by Neelam Upadhyaya on June 11, 2018 at 4:24pm

आदरणीय नवीन मणि जी, नमस्कार । खूबसूरत गजल के लिए मुबारकबाद कुबूल करें ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 9, 2018 at 2:57pm

वाह क्या कहने आदरणीय त्रिपाठी जी खूबसूरत ग़ज़ल..

Comment by रक्षिता सिंह on June 9, 2018 at 3:07am

आदरणीय नवीन जी नमस्कार , बेहतरीन गजल... मुबारकबाद कुबूल करें ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 8, 2018 at 11:10pm

आ0 लक्ष्मण धामी साहब शुक्रियः

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 8, 2018 at 11:09pm

आ0 महेंद्र कुमार जी सादर आभार।

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 8, 2018 at 11:08pm

आ0 तेजवीर सिंह साहब तहे दिल से शुक्रियः

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 8, 2018 at 11:07pm

आ 0 गुमनाम पिथौरा गढ़ी साहब सप्रेम आभार 

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