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कोई शिकवा गिला नहीं होता ।
तू अगर बावफ़ा नहीं होता ।।

रंग तुम भी बदल लिए होते ।
तो ज़माना ख़फ़ा नहीं होता ।।

आजमाकर तू देख ले उसको ।
हर कोई रहनुमा नहीं होता ।।

जिंदगी जश्न मान लेता तो ।
कोई लम्हा बुरा नहीं होता ।।

कुछ तो गफ़लत हुई है फिर तुझ से।
दूर इतना खुदा नहीं होता ।।

देख तुझको मिला सुकूँ मुझको ।
कैसे कह दूं नफ़ा नहीं होता ।।

दिल जलाने की बात छुप जाती ।
गर धुंआ कुछ उठा नहीं होता ।।

गर इशारा ही आप कर देते ।
मैं कसम से जुदा नहीं होता ।।

कुछ शरारत थी आँख की तेरी ।
बेसबब वह फ़िदा नहीं होता ।।

वो मुहब्बत की बात करते हैं ।
इश्क़ जिनको पता नहीं होता ।।

दर्द इतना है आपको शायद ।
आप से मशबिरा नहीं होता।।

आग सीने की बुझ गयी होती।
घर मेरा भी जला नही होता ।।

हाल मत पूँछ अजनबी बनकर ।
ज़ख्म तुझसे छुपा नहीं होता ।।

-- नवीन मणि त्रिपाठी

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by रक्षिता सिंह on June 15, 2018 at 3:23pm

आदरणीय नवीन जी नमस्कार , बहुत ही खूबसूरत गजल, दिली

मुबारकबाद कुबूल फरमायें ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 11, 2018 at 9:33pm

आ0 तेजवीर सिंह साहब हार्दिक आभार के साथ नमन

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 11, 2018 at 9:31pm

आ0 गुमनाम पिथौरागढ़ी साहब हार्दिक आभार

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 11, 2018 at 9:30pm

आ0 लक्ष्मण धामी साहब सादर आभार 

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 11, 2018 at 9:29pm

आ0 नीलम उपाध्याय जी सादर नमन के साथ आभार

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 11, 2018 at 9:27pm

आ0 बसन्त कुमार शर्मा साहब तहे दिल से शुक्रियः

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 11, 2018 at 3:23pm

वाह एक से बढ़कर एक शेर हुए हैं आदरणीय , बहुत बहुत बधाई आपको 

Comment by Neelam Upadhyaya on June 11, 2018 at 2:31pm

आदरणीय नवीन मणि जी, नमस्कार । खूबसूरत गजल की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई ।

"आग सीने की बुझ गयी होती। घर मेरा भी जला नही होता ।।

हाल मत पूँछ अजनबी बनकर । ज़ख्म तुझसे छुपा नहीं होता ।।"

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 11, 2018 at 8:33am

आ. भाई नवीन जी, बेहतरीन गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by gumnaam pithoragarhi on June 10, 2018 at 6:14pm

वाह इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए दिली मुबारकबाद......... वाह बहुत खूब।।।।।

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