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तुम्हारे जख्म सहलाये गये हैं

बहुत बेचैन वो पाये गए हैं ।
जिन्हें कुछ ख्वाब दिखलाये गये हैं ।।

यकीं सरकार पर जिसने किया था ।
वही मक़तल में अब लाये गए हैं।।

चुनावों का अजब मौसम है यारों ।
ख़ज़ाने फिर से खुलवाए गए हैं ।।

करप्शन पर नहीं ऊँगली उठाना ।
बहुत से लोग लोग उठवाए गये हैं ।।

तरक्की गांव में सड़कों पे देखी ।
फ़क़त गड्ढ़े ही भरवाए गये हैं ।।

पकौड़े बेच लेंगे खूब आलिम ।
नये व्यापार सिखलाये गये हैं ।।

बड़े उद्योग के दावे हुए थे ।
मिलों के दाम लगवाए गए हैं।।

मिली गंगा मुझे रोती हुई फिर ।
फरेबी जुल्म कुछ ढाये गये हैं ।।

इलेक्शन आ रहा है सोच लेना ।
तुम्हारे जख्म सहलाये गये हैं ।।

              -- नवीन मणि त्रिपाठी 

                मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Naveen Mani Tripathi on June 18, 2018 at 12:19pm

आ0 लक्ष्मण धामी साहब आभार टाइपो में लोग दो बार लिख़ उठा है एक हटा दूंगा । आभार

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 18, 2018 at 12:18pm

भाई गुमनाम पिथौरा गढ़ी जी हार्दिक आभार

Comment by gumnaam pithoragarhi on June 12, 2018 at 1:52pm

वाह बहुत खूब ग़ज़ल हुई है भाई जी बधाई.......

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 12, 2018 at 5:37am

आ. भाई नवीन जी, सुंदर गजल हुयी है । हार्दिक बधाई । 

बहुत से लोग लोग उठवाए गये हैं ।।

इस मिसरे दो बार लोग का प्रयोग अटपटा सा लग रहा है देखियेगा ।

Comment by रक्षिता सिंह on June 12, 2018 at 12:14am

आदरणीय नवीन जी नमस्कार, 

गजल में मतला और मक़्ता दोनों ही बेहतरीन  हैं ...अच्छी  गजल के लिए बहुत बहुत बधाई ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 11, 2018 at 9:45pm

आ0 बसन्त कुमार शर्मा  सादर आभार

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 11, 2018 at 9:44pm

आ0 सुशील शरण साहब हार्दिक आभार 

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 11, 2018 at 9:43pm

आ0 नीलम उपाध्याय जी सादर आभार 

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 11, 2018 at 9:42pm

आ0 तेजवीर सिंह साहब सप्रेम आभार के साथ नमन

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 11, 2018 at 3:25pm

बहुत खूब , वाह , उत्तम करारा व्यंग्य 

कृपया ध्यान दे...

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